मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context१५२ मनुस्मृति।
पिया, सोनार, घरकाट और अस्त्र बेंचनेवाले का अन्न न खाना।
कुत्तावाला, मद्यवाला, धोवी, रंगरेज़, निर्दयी और जिस के यहां
उपपति हो, इन सबका अन्न न लेना चाहिए ॥ २१३-२१६ ॥
मृष्यन्ति ये चोपपतिं स्त्रीजितानां च सर्वशः ।
अनिर्दशं च प्रेतान्नमतुष्टिकरणेव च ॥ २१७ ॥
राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम्।
आयुः सुवर्णकारान्नं यशश्चर्मविकर्तिनः ॥ २१८ ॥
कारुकान्नं प्रजां हन्ति बलं निर्णेजकस्य च ।
गणान्नं गणिकान्नं च लोकेभ्यः परिकृन्तति ॥ २१९ ॥
पूयं चिकित्सकस्यान्नं पुंश्चल्यास्त्वन्नमिन्द्रियम् ।
विष्ठा वार्धुषिकस्यान्नं शस्त्रविक्रयिणो मलम् ॥ २२०॥
जो स्त्री के जार को स्वीकृत किये हों, जो स्त्री के अधीन हों, दश
दिन तक मरण शौच का और जो सन्तोष न दे, इन अन्नों को न
खाना चाहिए। राजा का अन्न तेज, शूद्र का ब्रह्मतेज, सोनार का
आयु, मोची का यश, रसोईदार का प्रजा, धोवी का बल हर लेता
है। और समूह का अन्न, वेश्या का अन्न परलोक को बिगाड़ता है।
वैद्य का अन्न पीब के समान, व्यभिचारिणी का इन्द्रिय के समान,
व्याजखोर का विष्ठा के समान और हथियार बेंचनेवाले का मैल के
समान होता है। इन सब कुधान्यों को जहां तक बन पड़े बचाना
चाहिए ॥ २१७-२२० ॥
य एतेऽन्ये त्वभोज्यान्नाः क्रमशः परिकीर्त्तिताः ।
तेषां त्वगस्थिरोमाणि वदन्त्यन्नं मनीषिणः ॥ २२१ ॥
भुक्त्वातोऽन्यतमस्यान्नममत्याक्षपणं त्र्यहम् ।
मत्या भुक्त्वा चरेत्कृच्छ्रं रेतोविण्मूत्रमेव च ॥ २२२ ॥