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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 284 of 649

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Page 284

१४४ मनुस्मृति ।
शनैरावर्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति ॥ १७२ ॥
यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पुत्रेषु नप्तृषु ।
न त्वेवतु कृतोऽधर्मः कर्तुर्भवति निष्फलः ॥ १७३ ॥
अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति ।
ततः सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति ॥ १७४ ॥
अधर्मी-पापी पुरुष की दशा बदलती अर्थात् उन्नति आदि होते
देखकर पुरुष को धर्माचरण करने में दुःखभी होता हो तोभी उस
को न छोड़ना चाहिए। धर्म में ही मन लगा रखना चाहिए। जैसे
भूमि में बीज बोने पर वह तत्काल फल नहीं दे सकता वैसेही अ-
धर्म का फल भी तुरंत नहीं मिलता। किन्तु धीरे धीरे वह करनेवाले
का जड़ से नाश करदेता है। अधर्म का फल करनेवाले को न हुआ
तो उसके पुत्र को होगा, पुत्र को नहीं तो पौत्र को अवश्य होगा।
किन्तु बिना फल भोग किए छुटकारा नहीं होता। अधर्मी पहले
धन आदि से बढ़ता है। सुख भोगता है, अपने शत्रुओं को जीत
लेता है, लेकिन अन्त में जड़ मूल से नष्ट होजाता है ॥१७१-१७४॥
सत्यधर्मार्यवृत्तेषु शौचे चैवारमेत्सदा ।
शिष्यांश्च शिष्याद्धर्मेण वाग्बाहूदरसंयतः ॥ १७५ ॥
परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ ।
धर्मं चाप्यसुखोदर्कं लोकविक्रुष्टमेव च ॥ १७६ ॥
न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलोऽनृजुः ।
न स्याद्वाकचपलश्चैव न परद्रोहकर्मधीः ॥ १७७ ॥
सत्य, धर्म और सदाचार में सदा लगा रहना चाहिए। जबान,
हाथ और पेट को नियम में रखकर, पुत्र स्त्री आदि को शिक्षा देनी
चाहिए। जो धर्म से रहित हो ऐसे अर्थ-काम को छोड़देना,