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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 250 of 649

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Page 250

११० मनुस्मृति ।
तिलैर्व्रीहियवैर्माषैरद्भिर्मूलफलेन वा ।
दत्तेन मासं तृप्यन्ति विधिवत् पितरो नृणाम् ॥ २६७॥
द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन्मासान् हारिणेन तु ।
औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनाथ पञ्च वै ॥ २६८ ॥
षण्मासांश्छागमांसेन पार्षतेन च सप्त वै ।
अष्टावेणस्य मांसेन रौरवेण नवैव तु ॥ २६६ ॥
दशमासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः ।
शशकूर्म्मयोस्तु मांसेन मासानेकादशैव तु ॥ २७० ॥
संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन च ।
वार्घ्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी ॥ २७१ ॥
ब्राह्मणों को विदा करके उस स्थान से जूठ उठाकर, फिर
वैश्वदेव और भूतबलि आदि करे-यह धर्मव्यवस्था है। पितरों को
विधि से हवि देने से जो चिरकालतक अक्षय तृप्ति होती है वह इस
प्रकार है-तिल, धान्य, यव, उड़द, जल, मूल और फल विधिपूर्वक
पितरों को देने से, एक मास तक तृप्ति होती है। मछली और मांस
से दो मास, हरिण के मांस से तीन मास, मेंढा के मांस से चार
और भक्ष्य पक्षियों के मांस से पांच मास तक तृप्ति होती है।
बकरा के मांस से छः मास, चित्रमृग के मांस से सात मास, मृग
से आठ मास और रुरु मृग से नव मास तक तृप्ति होती है।
शूकर और महिष के मांस से दश मास, खरगोश और कछुआ
से ग्यारह मास तक तृप्ति होती है। गौके दूध वा उसकी खीर
से साल भर और लम्बे कान और नाकवाले बूढ़े बकरे के मांस
से बारह वर्ष तक तृप्ति होती है ॥ २६५-२७१ ॥
कालशाकं महाशल्काः खड्गलोहामिषं मधु ।
आनन्त्यायैव कल्प्यन्ते मुन्यन्नानि च सर्वशः ॥२७२॥