मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context१०८ मनुस्मृति ।
पित्र्ये स्वदितमित्येव वाच्यं गोष्ठे तु सुश्रुतम् ।
संपन्नमित्यभ्युदये दैवे रुचितमित्यपि ॥ २५४ ॥
अपराह्णं तथा दर्भा वास्तुसंपादनं तिलाः ।
सृष्टिर्मृष्टिर्द्विजाश्चाग्र्याः श्राद्धकर्मसु संपदः ॥ २५५ ॥
दर्भाः पवित्रं पूर्वाह्णे हविष्याणि च सर्वशः ।
पवित्रं यच्च पूर्वोक्तं विज्ञेया हव्यसंपदः ॥ २५६ ॥
मुन्यन्नानि पयः सोमो मांसं यच्चानुपस्कृतम् ।
अक्षारलवणं चैव प्रकृत्या हविरुच्यते ॥ २५७ ॥
माता पिताके एकोद्दिष्ट और पार्वणश्राद्ध में ' 'स्वदितम्'
'गोष्ठीश्राद्ध में 'सुश्रुतम्' वृद्धिश्राद्ध में 'सम्पन्नम्' और देवकर्म
में 'रुचितम्' ऐसा कहकर ब्राह्मणों से उनकी तृप्ति को पूंछ लेवे ।
अपराह्न काल, कुश, गोबर से लिपी भूमि, तिल, निःसंकोच
भोजन देना, भोजन का स्वाद और पंक्तिपावन ब्राह्मण श्राद्ध
कर्म में उत्तम गिना जाता है। कुश, वेदमंत्र, पूर्वाह्न काल, हवि का
अन्न और पूर्वोक्त भूमि आदि की पवित्रता, ये सब देवकर्म की
सम्पत्ति हैं। मुनियों का अन्न-नीवार आदि, दूध, सोमलता का
रस, कच्चा मांस, सैंधानमक, ये सब पदार्थ स्वभाव से ही हवि
कहलाते हैं ॥ २५४-२५७ ॥
विसृज्य ब्राह्मणांस्तांस्तु नियतो वाग्यतः शुचिः ।
दक्षिणांदिशमाकाङ्क्षन्याचेतेमान्वरान्पितॄन्॥ २५८॥
दातारो नोऽभिवर्द्धन्तां वेदाः संततिरेव च ।
श्रद्धा च नो मा व्यगमद्बहु देयं च नोऽस्त्विति॥२५६॥
एवं निर्वपणं कृत्वा पिण्डांस्तांस्तदनन्तरम् ।
गां विप्रमजमग्निं वा प्राशयेदप्सु वा क्षिपेत्॥ २६० ॥