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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 244 of 649

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Page 244

१०४ मनुस्मृति ।
अस्रं गमयति प्रेतान् कोपोऽरीननृतं शुनः ।
पादस्पर्शस्तु रक्षांसि दुष्कृतीनवधूननम् ॥ २३० ॥
यद्यद्रोचेत विप्रेभ्यस्तत्तद्दद्यादमत्सरः ।
ब्रह्मोद्याश्च कथाः कुर्यात् पितॄणामेतदीप्सितम् ॥ २३१ ॥
स्वाध्यायं श्रावयेत् पित्र्ये धर्मशास्त्राणि चैव हि ।
आख्यानानीतिहासांश्च पुराणान्यखिलानि च ॥ २३२॥
हर्षयेद्ब्राह्मणांस्तुष्टो भोजयेच्च शनैः शनैः ।
अन्नाद्येनासकृच्चैतान् गुणैश्च परिचोदयेत् ॥ २३३ ॥
आँसू गिराने से श्राद्धफल प्रेतों को होता है। कोप करने से
शत्रुओं को, झूठ बोलने से कुत्तों को, पैर से ठोकर देने से राक्षसों
को और उछालने से पापियों को फल पहुँचता है। जो जो पदार्थ
ब्राह्मणों को प्रिय लगे उसको अच्छीतरह परोसे और ईश्वर
सम्बन्धी कथाएं कहे, क्योंकि वह पितरों को प्रिय होती हैं। ब्रा-
ह्मणों को वेद, धर्मशास्त्र, आख्यान, इतिहास, पुराण आदि सुनावे।
खूब प्रसन्न करे, धीरे धीरे भोजन करावे और वारंवार पदार्थों के
गुण वर्णन करके भोजन में उन लोगों को प्रवृत्त करे ॥ २३०-२३३ ॥
व्रतस्थमपि दौहित्रं श्राद्धे यत्नेन भोजयेत् ।
कुपतं चासने दद्यात्तिलैश्च विकिरेन्महीम् ॥ २३४ ॥
त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः ।
त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ॥ २३५ ॥
अत्युष्णं सर्वमन्नं स्याद्भुञ्जीरंस्ते च वाग्यताः ।
न च द्विजातयो ब्रूयुर्दात्रा पृष्टा हविर्गुणान् ॥ २३६ ॥
दौहित्र—कन्या का पुत्र, ब्रह्मचर्य व्रत में भी हो, तोभी उसको
यत्न करके श्राद्ध में खिलावे। उसको बैठने के लिए कुपत—हिमा-
लय के समीप का बना कम्बल देवे और श्राद्धभूमि में तिलछीट