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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 236 of 649

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Page 236

६६ मनुस्मृति।
मेदोऽसृङ्मांसमज्जास्थि वदन्त्यन्नं मनीषिणः ॥ १८२॥
वेदज्ञ भी जो शूद्र याजक का दान लोभ से लेता है, वह पानी में
कच्चे वरतन की भांति शीघ्र ही नष्ट होजाता है । सोमलता बेंचने
वाले को जो हव्य, कव्य देवे वह विष्ठा होती है । वैद्य को देने से
पीव-रक्त, देवलक-पुजारी को देने से नाश, व्याजखोर को देने से
निष्फल होजाता है । श्राद्ध में जो वाणिज्य करनेवाले को दिया
जाता है वह दोनों लोक में निष्फल होता है । पुनर्विवाह के लड़के
को देने से राख में होम की भांति व्यर्थ होता है और जो दूषित
मनुष्य हैं उनको देने से दाता के जन्मान्तर में भोजन के लिए-
मेद, रुधिर, मांस, मज्जा और हड्डी होजाता है ॥ १७६-१८२ ॥
अपांक्त्योपहता पंक्तिः पाव्यते यैर्द्विजोत्तमैः ।
तान्निबोधत कात्स्न्र्येनद्विजाग्र्यान्पंक्तिपावनान्॥ १८३॥
अग्र्याः सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च ।
श्रोत्रियान्वयजाश्चैव विज्ञेयाः पंक्तिपावनाः॥ १८४॥
त्रिणाचिकेतः पञ्चाग्निस्त्रिसुपर्णः षडङ्गवित् ।
ब्रह्मदेयात्मसन्तानो ज्येष्ठसामग एव च ॥ १८५ ॥
दूषित पंक्ति जिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से पवित्र होती है वे इस प्रकार
के होने चाहिएं-जो चारों वेदों के जाननेवाले और उसके अङ्गों
के जाननेवाले, श्रोत्रिय और परम्परा से वेदाध्यायी हैं वेही पंक्ति
पावन होते हैं । त्रिणाचिकेतनामक यजुर्वेद के भाग को पढ़ने
वाला ब्राह्मण, पञ्चाग्निहोत्री, त्रिसुपर्ण नामक ऋग्वेद के भाग को
पढ़नेवाला, शिक्षा आदि छः अङ्गों का ज्ञाता, ब्राह्मविवाह से पैदा
पुत्र और साम गान करनेवाला ये छः पंक्तिपावन जानना
चाहिए ॥ १८३-१८५ ॥
वेदार्थवित्प्रवक्ता च ब्रह्मचारी सहस्रदः ।
शतायुश्चैव विज्ञेया ब्राह्मणाः पंक्तिपावनाः ॥ १८६ ॥