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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 226 of 649

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Page 226

८६ मनुस्मृति ।
पितृयज्ञं तु निर्वर्त्य विप्रश्चेन्दुक्षयेऽग्निमान् ।
पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्धं कुर्यान्मासानुमासिकम्॥१२२॥
पितॄणां मासिकं श्राद्धमन्वाहार्यं विदुर्बुधाः ।
तच्चामिषेण कर्तव्यं प्रशस्तेन प्रयत्नतः ॥ १२३ ॥
तत्र ये भोजनीयाः स्युर्ये च वर्ज्या द्विजोत्तमाः ।
यावन्तश्चैव यैश्चान्नैस्तान्प्रवक्ष्याम्यशेषतः॥१२४॥
द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनैकैकमुभयत्र वा ।
भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे ॥ १२५ ॥
सत्क्रियां देशकालौ च शौचं ब्राह्मणसंपदः ।
पञ्चैतान् विस्तरो हन्ति तस्मान्नेहेत विस्तरम् ॥ १२६ ॥
श्राद्ध-प्रकरण ।
अग्निहोत्री द्विज अमावास्या को पितृयज्ञ पूरी करके प्रतिमास
पिण्डान्वाहार्यक श्राद्ध को करे । पितरों का हर मास में जो श्राद्ध
होता है उसको अन्वाहार्यक श्राद्ध कहते हैं । वह उत्तम मांस से
करना चाहिए । उसमें जो ब्राह्मण ग्राह्य हैं और जो त्याज्य हैं
जितने भोजन कराने चाहिएं और जो अन्न चाहिए उसका विस्तार
इस प्रकार है—
देवकर्म में दो ब्राह्मण और पितृकर्म में तीन ब्राह्मण या दोनों में
एक एक ही भोजन कराना चाहिए । धनी पुरुष भी अधिक
ब्राह्मणों के भोजन में न लगे । विस्तार करने से ब्राह्मणों का
सत्कार, देश, काल, पवित्रता और श्रेष्ठ ब्राह्मण इन पाँचों को नष्ट
करता है। इसलिए ज्यादा फैलाव कभी न करना चाहिए।१२२-१२६॥
प्रथिता प्रेतकृत्यैषा पित्र्यं नाम विधुक्षये ।
तस्मिन्युक्तस्यैति नित्यं प्रेतकृत्यैव लौकिकी ॥ १२७ ॥
श्रोत्रियायैव देयानि हव्यकव्यानि दातृभिः ।
अर्हत्तमाय विप्राय तस्मै दत्तं महाफलम् ॥ १२८ ॥