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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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५२ मनुस्मृति।
आहैव स नखाग्रेभ्यः परमं तप्यते तपः।
यःस्रग्व्यपिद्विजोऽधीतेस्वाध्यायं शक्तितोऽन्वहम्॥१६७॥
योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः॥१६८॥
इस क्रम से गर्भाधानादि उपनयनान्त संस्कारों से पवित्र द्विज
गुरुकुल में वेद प्राप्ति योग्य तप करे। द्विज को तपों से और
नाना प्रकार के व्रतों से संपूर्ण वेद और उपनिषदों का ज्ञान
संपादन करना चाहिए। तप करने की इच्छा से वेद का सदा
अभ्यास करे। वेदाभ्यास ही ब्राह्मण का परम तप कहा गया है।
जो द्विज पुष्पमाला को भी धारण करके अर्थात् ब्रह्मचारी का
नियम न रखकर भी नित्य यथाशक्ति वेदाध्ययन करता है वह
नख-शिख से परम तप करता है। जो द्विज वेद को न पढ़कर
दूसरे शास्त्रों में श्रम करता है, वह जीताहुआ ही वंश के साथ
शूद्रता को प्राप्त होता है ॥ १६४-१६८ ॥
मातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जिबन्धने।
तृतीयं यज्ञदीक्षायां द्विजस्य श्रुतिचोदनात् ॥ १६६ ॥
तत्र यद्ब्रह्मजन्मास्य मौञ्जीबन्धनचिह्नितम्।
तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते॥१७०॥
वेदप्रदानादाचार्यं पितरं परिचक्षते।
न ह्यस्मिन् युज्यते कर्म किंचिदामौञ्जिबन्धनात्॥१७१॥
श्रुति की आज्ञा से द्विज का माता से पहला जन्म, उपनयन
से दूसरा जन्म, ज्योतिष्टोम आदि यज्ञदीक्षा लेने पर तीसरा जन्म
होता है। इन तीनों में उपनयनवाले ब्रह्मजन्म में सावित्री-गायत्री
माता और आचार्य पिता कहा जाता है। वेद के अध्यापन से
आचार्य को पिता कहते हैं। उपनयन के बिना बालक को श्रौत-
स्मार्त कर्मों का अधिकार नहीं होता ॥ १६६-१७१ ॥

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