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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 189 of 649

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Page 189

दूसरा अध्याय । ४६
पैदा करनेवाला पिता और वेदाध्यापक गुरु में, गुरु श्रेष्ठ है ।
क्योंकि वह ब्रह्मजन्म का दाता है, उसी से लोक, परलोक में स्थिर
सुख मिलता है। माता और पिता कामवश होकर जो बालक
पैदा करता है, वह जिस योनि से जाता है, उसी प्रकार उसके
हाथ, पैर अङ्ग होजाते हैं। परन्तु वेदविशारद आचार्य, गायत्री
उपदेश से जो बालक की जाति उत्पन्न करता है वह जाति सत्य,
अजर और अमर है । जो उपाध्याय वेद पढ़ाकर, जिसका थोड़ा
वा बहुत उपकार करता है, उसको भी गुरु के समान जानना
चाहिए ॥ १४६-१४६ ॥
ब्राह्मस्य जन्मनः कर्ता स्वधर्मस्य च शासिता ।
बालोऽपि विप्रो वृद्धस्य पिता भवति धर्मतः ॥ १५० ॥
अध्यापयामास पितॄन् शिशुराङ्गिरसः कविः ।
पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्य तान् ॥ १५१ ॥
ते तमर्थमपृच्छन्त देवानागतमन्यवः ।
देवाश्चैतान्समंत्योचुर्न्याय्यं वः शिशुरुक्तवान् ॥ १५२ ॥
ब्रह्म-वेद पढ़ाने योग्य जन्म देनेवाला और स्वधर्म की शिक्षा
देनेवाला ब्राह्मण यदि बालक हो तो भी वह धर्मानुसार बूढ़ों के
पिता समान है। अङ्गिरा मुनि के पुत्र ने थोड़ी उमर में अपने
चाचा, मामा आदि को वेद पढ़ाया और धर्मबुद्धि से उनको 'हे
लड़को' ऐसा पुकारा था । उस पर वे लोग क्रोध से देवताओं
से इसका अर्थ पूँछा, तब उन्हों ने कहा कि बालक ने उचित रीति
से तुमको पुकारा है ॥ १५०-१५२ ॥
अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः ।
अज्ञं हि बालमित्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ॥ १५३ ॥
न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः ।
ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥ १५४ ॥