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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 184 of 649

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Page 184

४४ मनुस्मृति।
ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आयति ।
प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान्प्रतिपद्यते ॥ १२०॥
जिससे लौकिक विषय, या वैदिक क्रिया या ब्रह्मविद्या को सीखे
उसको पहले प्रणाम करना चाहिए। जो केवल गायत्री जानता हो,
जितेन्द्रिय हो वह ब्राह्मण मान्य होता है। और जो तीनों वेदोंका भी
ज्ञाता हो पर भक्ष्याभक्ष्य का विचार न रखता हो, सब निषिद्ध
चीज़ें बेंचता हो वह माननीय नहीं होता । जिस शय्या और आसन
पर, अपने से श्रेष्ठ-बड़ा बैठता हो उस पैर कभी न बैठे। स्वयं
आसान वा शय्या पर बैठा हो तब कोई पूज्य आवे तो उठकर
प्रणाम करना चाहिए । गुरु या किसी श्रेष्ठ के आने पर युवा
पुरुष के प्राण संभ्रम से ऊपर चढ़ते हैं, फिर उठकर प्रणाम आदि
करने पर वे प्राण स्वस्थ होते हैं । इसलिए अवश्य स्वागत
करना चाहिए ॥ ११७-१२० ॥
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥ १२१ ॥
अभिवादात्परं विप्रो ज्यायांसमभिवादयन् ।
असौ नामाहमस्मीति स्वं नाम परिकीर्तयेत् ॥ १२२ ॥
नामधेयस्य ये केचिदभिवादं न जानते ।
तान्प्राज्ञोऽहमिति ब्रूयात् स्त्रियः सर्वास्तथैव च ॥१२३॥
भोः शब्दं कीर्तयेदन्ते स्वस्य नाम्नोऽभिवादने ।
नाम्नां स्वरूपभावो हि भोभावऋषिभिः स्मृतः ॥१२४॥
आयुष्मान् भव सौम्येति वाच्यो विप्रोऽभिवादने ।
अकारश्चास्य नाम्नोऽन्ते वाच्यः पूर्वाक्षरः प्लुतः ॥ १२५ ॥
जो पुरुष बड़ों की सेवा और उनको प्रणाम करता है उसकी
आयु, विद्या, यश और बल ये चारों बढ़ते हैं। वृद्ध को प्रणाम
करता हुआ विप्र, 'मैं अमुक नाम हूं' ऐसा कहे। जो प्रणम्य ...