मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextदूसरा अध्याय। ४१
देकर, अच्छी रीति से, अपने कार्यों का साधन करना
चाहिए ॥ ६६-१०० ॥
पूर्वा सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत्सावित्रीमार्कदर्शनात् ।
पश्चिमां तु समासीनः सम्यगृक्षविभावनात् ॥ १०१ ॥
पूर्वा सन्ध्यां जपंस्तिष्ठन्नैशमेनो व्यपोहति ।
पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ॥ १०२ ॥
न तिष्ठति तु यः पूर्वा नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् ।
स शूद्रवद्बहिष्कार्यः सर्वस्माद्द्विजकर्मणः ॥ १०३ ॥
अपां समीपे नियतो नैत्यकं विधिमास्थितः ।
सावित्रीमप्यधीयीत गत्वारण्यं समाहितः ॥ १०४ ॥
वेदोपकरणे चैव स्वाध्याये चैव नैत्यके ।
नानुरोधोऽस्त्यनध्याये होममन्त्रेषु चैव हि ॥ १०५ ॥
प्रातःकाल सन्ध्या और गायत्रीजप का समय सूर्यदर्शन तक
रहता है और सायंकाल में नक्षत्रदर्शन तक रहता है। प्रातःसन्ध्या
से रात में किया हुआ साधारण दोष और सायंसन्ध्या से दिन में
किया हुआ साधारण दोष दूर होजाता है। जो प्रातःसन्ध्या और
सायंसन्ध्या नहीं करता उसको शूद्र की भांति सब द्विजाति के
कामों से अलग करदेना चाहिए। जलके पास या वन में, एकाग्र
होकर, नित्य कर्म, गायत्रीजप और स्वाध्याय को करे। वेद के छ
अङ्गों को पढ़ने में, नित्य स्वाध्याय में, ब्रह्मयज्ञ और होममन्त्र पढ़ने
में, अनध्याय नहीं माना जाता है ॥ १०१-१०५ ॥
नैत्यके नास्त्यनध्यायो ब्रह्मसत्रं हि तत्स्मृतम् ।
ब्रह्माहुतिहुतं पुण्यमनध्यायवषट्कृतम् ॥ १०६ ॥
यः स्वाध्यायमधीतेऽब्दं विधिना नियतः शुचिः ।
तस्य नित्यं क्षरत्येष पयो दधि घृतं मधु ॥ १०७ ॥