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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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सो सब रहे पूर्ण यज्ञ नाहीं। नामहि महिमा जानत नाहीं ॥
सुपच जान भल नाम प्रभाऊ। तातें पूरण यज्ञ कराऊ ॥
कृष्ण शक्ति में मुनि ऋषि झूला। जान बूझि कै पंडित भूला ॥
बूझौ संतो नाम हमारा। नाम बिना किमि उतरो पारा ॥

साहिब कह रहे हैं कि सबके खाने से घंटा नहीं बजा, क्योंकि कोई भी नाम की महिमा को नहीं जानता था। सुपच नाम के प्रताप को जानता था, इसलिए उसके भोजन करने से यज्ञ पूर्ण हुआ। कृष्ण जी, शक्ति आदि की भक्ति में संसार लगा है, पर हे संतो, हमारे नाम का रहस्य समझो; नाम के बिना कोई पार नहीं हो पायेगा।

कृष्ण पारथ ही वेग बुलावा। तेहि पुनि निज मतौ सुनावा ॥
गोपी लैके जाऊँ मैं जहँवा। पुर वैकुंठ सुमेर है तहँवा ॥
मथुरा तैं तुम वेग लै आवहु। जाहु तुरंत गहर जनि लावहु ॥
चल भयो पार्थ हाथ धनु तीरा। गोपी लैन कोटिन यदुबीरा ॥
आपस में जो करे लड़ाई। इक मारे एक मरजाई ॥
छप्पन कोटि जो सबै सिरानो। सो नट षट कृष्णहि के जानो ॥
अष्ट कन्या लखी चित्रसार। तिनकहँ कृष्ण जो यहि विधि मारी ॥

कृष्ण जी ने तब अर्जुन को बुलाकर कहा कि तुम गोपियों को बुलाकर ले आओ, मैं उन्हें बैकुण्ठ में लेकर जाना है। तुम उन्हें मथुरा से ले आओ। अर्जुन धनुष बाण लेकर उन्हें लेने चल पड़ा। कृष्ण जी ने ऐसा किया कि वो सब एक दूसरे से लड़कर मर गये।

मारिन सब जेती हती, कृष्ण काल बरियान ॥

तब अपने मन में गुनौ, करो उदधि अस्थान ॥

इस तरह सबको मार दिया गया।

वधिक देव घात संघाना। बालि बैर को भाव जो जाना ॥
जम सब प्रान घेर लै गयेऊ। मार्यो कृष्ण मूर्छित भयेऊ ॥
निरंकार निरंजन राऊ। आपहि मारि जो ताहि नसाऊ ॥
बालि का बैर व्याध जब लीन्हा। यह तो भेद न काहू चीन्हा ॥