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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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कृष्ण वचन सुनि युधिष्ठिर राया। भगत बुलावन दूत पठाया ॥
सुनि के दूत चले चहुँ देश। नहिं कोई भक्तन भेटें वेश। ॥
चले भीम तब लागि न बारा। चहुँ दिश फिर काशी पगुधारा ॥
बैठे सुपच ताहि सों कहई। निर्गुण भक्त यहाँ कोई रहई ॥
कहै सुपच निर्गुण को जानों। सतगुरु महिमा सदा बखानो ॥

सबने भोजन किया, पर यज्ञ को पूर्ण करने वाला घंटा नहीं बजा, जिससे राजा युधिष्ठिर को लज्जा हुई। उन्होंने कृष्ण जी से पूछा कि अब क्या किया जाए? कृष्ण जी ने कहा कि ऐसे भक्त की खोज करो, जो सद्गुरु की महिमा गाता हो। उसे विनय भाव के साथ ले आओ और भोजन खिलाओ। यह सुन युधिष्ठिर ने दूत को ऐसे भक्त को बुलाने भेजा। पर दूत को ऐसा कोई भक्त नहीं मिला। फिर भीम चले और चलते-चलते काशी जी में पहुँचे और वहाँ सुपच भक्त को देखा। सुपच सदा सद्गुरु की महिमा गाने वाला था।

कहै भीम सुन हरिजन, कृपा करो मम संग ॥

चलो जहाँ हरि बैठे, स्वामी बाल गुविन्द ॥

भीम ने कहा कि हे हरिजन, कृपा करके वहाँ चलो, जहाँ हरि हैं।
कहै सुपच प्रभु कैसे कहऊ। कालहि जान कृष्ण परिहरऊ ॥
सुनतहि भीम कोप तब कीन्हा। यामैं कहा भक्त वर चीन्हा ॥
यहि मारो तो राख रिसाई। कह्यो मंत्र राजा पर जाई ॥
तीन लोक के जे प्रभुराई। तिनको भाखै काल कसाई ॥
कृष्णहि कहै काल की फांसी। कीन्ही आय भक्त की हांसी ॥
मार्यो नहिं पर तव भय माना। यह सुनकर बिहसे भगवाना ॥

सुपच ने कहा कि प्रभु कैसे कह रहे हो! सब ही तो काल के रूप हैं। यह सुन भीम ने क्रोध किया और बुरा भला कहकर वापिस आ गया। वापिस आकर कृष्ण जी से कहा कि मैंने आपके भय से उसे मारा नहीं। यह सुन कृष्ण जी हँस पड़े।

जाव युधिष्ठिर वेद गै, तुम आनो गहि पांय ॥