मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextकौरव आई जो करहि लड़ाई। ताहि कृष्ण छल से मरवाई ॥
मार्यो करण गंगसुत द्रोना। सबको मारि कियो दल सूना ॥
मार्यो दुर्घोधन जो राई। अठारह क्षोहणी मार गिराई ॥
तब फिर कृष्ण जी ने बड़े चरित्र किये। पाँच पाण्डव उनकी बड़ी सेवा करते थे, जिन्हें वे बड़ा प्यार करते थे। फिर दोनों में वैर उत्पन्न किया गया। सब मारे गये, जिसे कोई समझ नहीं पाया। गंगासुत भीष्म, करण आदि कई छल से मारे गये।
पाँचों पांडव बचि रहे, औ बूझो सब झार ॥
धरमराय अस कीन्हा, कृष्ण परी हंकार ॥
पाँच पाण्डवों को छोड़कर बाकी सब मारे गये। यह सब काल का तमाशा था। तब कृष्ण जी को निरंजन ने बुलाया।
चल भये कृष्ण स्वर्ग अस्थाना। शून्य आदि जहँ शशि नहिं भाना ॥
पुर वैकुंठ ते आगे गयेऊ। तहाँ जाइ के स्तुति कियेऊ ॥
अलख निरंजन अंतर्धामी। सब तें न्यारे हो तुम स्वामी ॥
सबमें व्याप्त निरंजन राया। पाँचों तत्व शून्य उपजाया ॥
तुमही ब्रह्मा विष्णु महेशा। आदि अंत तुम देव गणेशा ॥
अहो कृपालु कृपानिधि स्वामी। करहु दया तुम अन्तरयामी ॥
ततक्षण भई आकाश तें वाणी। अहो कृष्ण सबको उत्पानी ॥
अब जो कहैं करो सो जानी। सोई वचन सेव सिर मानी ॥
तुम भेजा महि भार उतारहु। असुरन को विध्वंस के मारहु ॥
तब कृष्ण जी शून्य में वहाँ गये, जहाँ न सूर्य था न चाँद। वैकुण्ठ से भी आगे जाकर अलख निरंजन की स्तुति की और पूछा कि क्या चाहते हैं? तब आकाशवाणी हुई कि तुम्हें धरती का भार उतारने को भेजा गया है, असुरों का विध्वंस करने भेजा है।
मारहु यादव वंश कहाँ, मानो वचन रसाल ॥
गोपी जाय संहारो, तेहि पाछे तुव काल ॥
निरंजन ने कहा कि अब तुम यादव वंश का भी नाश करो और काल बनकर गोपियों का भी संहार करो, सबको मारो।