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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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कहे धर्म सुनु आदि कुमारी। अब जनि डरपो त्रास हमारी॥
पुरुष रचा तोहि हमरे काजा। इक मति होय करहु उपराजा॥
हम हैं पुरुष तुमहिं हो नारी। अब जनि डरपो त्रास हमारी॥

निरंजन ने शक्ति से कहा कि हे कुमारी, मुझसे मत डरो, परम पुरुष ने तुम्हें मेरे काम के लिए रचा है, इसलिए दोनों मिलकर राज्य करते हैं। मैं पुरुष हूँ और तुम मेरी नारी हो, मुझसे मत डरो।

कहे कन्या कैसे बोलहु बानी। भ्राता जेठ प्रथम हम जानी॥
कन्या कहै सुनो हो ताता। ऐसी विधि जनि बोलहु बाता॥
अब मैं पुत्री भई तुम्हारी। ताते उदर माँझ लियो डारी॥
जेठ बंधु प्रथमहि के नाता। अब तो अहो हमारे ताता॥
निरमल दृष्टि अब चितवहु मोही। नहिं तो पाप होय अब तोही॥

आदि-शक्ति ने कहा कि यह कैसी बात बोल रहे हो। पहले नाते से तो तुम मेरे बड़े भाई हो चुके हो, क्योंकि परम पुरुष के बच्चे हैं हम और दूसरे नाते से मैं तुम्हारी पुत्री हो गयी हूँ, क्योंकि तुमने मुझे पेट में डाल लिया था और वहाँ से मैं निकली हूँ, इसलिए तुम मेरे पिता हो गये हो। अब तुम मुझे निर्मल दृष्टि से देखो अन्यथा तुम्हें पाप लगेगा।
कहे निरंजन सुनो भवानी। यह मैं तोहि कहों सहिदानी॥
पाप पुण्य डर हम नहिं डरता। पाप पुण्य के हमहीं करता॥
पाप पुण्य हमहीं से होई। लेखा मोर न लेहै कोई॥
पाप पुण्य हम करम पसार। जो बूझो सो होय हमारा॥
ताते तोहि कहों समुझाई। सिख हमार लो सीस चढ़ाई॥
पुरुष दीन तोहि हम कहँ जानी। मानहु कहा हमार भवानी॥

निरंजन ने कहा कि मैं पाप पुण्य से नहीं डरता हूँ, क्योंकि पाप पुण्य का कर्ता मैं ही हूँ, मेरे पाप पुण्य का हिसाब लेने वाला कोई नहीं है और आगे मैं पाप पुण्य कर्मों का जाल ही फैलाऊँगा और जो इनमें उलझ जायेगा, वो कहीं नहीं जा पायेगा, हमारा ही रहेगा।