मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextदो शब्द
सत्याद के काबू में हैं सब जीव बेचारे ॥
एक बार मैंने 'इंडिया टूडे' में एक लेख पढ़ा, जो वर्ष का महावाक्य था। राष्ट्रपति रीगन के पी. ए. ऐलेक्जेंडर ने वो लेख लिखा था। उसने लिखा था— “मुझे यूँ लगता है कि हम सब धरती पर जीने वाले लोग एक शैतानी ताकत के हाथ में खेल रहे हैं। मुझे लगता है कि हम सबका संचालन एक शैतानी ताकत करती है। वो ताकत जब भी चाहे, धरती पर रहने वाले सभी मनुष्यों की बुद्धि को एक साथ एक ही दिशा में घुमा सकती है। वो ताकत पुरी दुनिया के लोगों के विचार बदल सकती है। मुझे ऐसा लग रहा है, वो शक्ति हम सबको विनाश की तरफ ले जा रही है।”
कितनी ऊँची बात लिखी थी। उसने मंथन किया होगा। मुझे लग रहा है कि उसने साहिब की वाणी पढ़ी होगी। अगर नहीं पढ़ा तो उसे धन्यवाद दूँगा कि इतनी ऊँची बात उसके दिमाग में आ गयी। साहिब तो कह रहे हैं—
मन तरंग में जगत भुलाना ॥
यह सारा संसार मन की तरंगों में बहे जा रहा है, मन के कहे अनुसार संसार में अनात्म कार्य किये जा रहा है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि किसी को भी मन समझ में नहीं आ रहा है। यही मन काल है। यही मन सबको विनाश की तरफ लिए जा रहा है। मन को न समझ पाने से सब अज्ञानवश पाप कर्मों में उलझ गये हैं, क्योंकि यही पाप-कर्म करवा रहा है। मन की ही भक्ति करते हुए सब काल के मुँह में जा रहे हैं, क्योंकि यह सत्य-पुरुष की सत्य भक्ति की तरफ किसी को आसानी से नहीं जाने दे रहा और अपनी ही भक्ति करवा रहा है।
अकथ कथा या मनहि की, कहैं कबीर समुझाय।
जो जाको समझा परै, ताको काल न खाय ॥