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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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रोग और शोक। इस तरह इस मोह राजा का बहुत बड़ा परिवार है, बहुत बड़ी सेना है। मोह की इस सेना से बचना आसान काम नहीं है, इसलिए साहिब कह रहे हैं—

यह सेना सब मोह की, कहैं कबीर समझाया।

इनते जो कोई बाचई, भवसागर तरि जाय ॥

फिर अंत में आता है—अहंकार। यह इन सबसे ही खतरनाक है। इसकी स्त्री है—निन्दा। जिसमें अहंकार होगा, दूसरे की निंदा करेगा। अहंकार के अनेक रूप हैं। किसी को धन का, किसी को जवानी का, किसी को बुद्धि का तो किसी को बल का अहंकार घेरे रहता है। जब व्यक्ति में अहंकार आता है तो अपने समान किसी को नहीं मानता है। छिन छिन गर्व हिया में आवे। आगे कुटिल सबही दिखलावे ॥
ऐंठत चलै निहारत पागा। गर्व खबीस तबहिं उठि लाग ॥
ऐंठ अकड़ अभिमानी माहीं। अभिमानी नीचा हों नाहीं ॥
मूँछे ताव निहारत छांही। काँधे धरे अवर की बाँहीं ॥
टेढ़ी पाग गर्व मन धरई। मन महाँ ऊमतवालो फिरई ॥
अनीति वचन औरन सों बकै, हमरी बरोबरी को करि सकै ॥

अहंकारी में अकड़ होती है। वो दूसरे को कुछ नहीं गिनता है। दूसरों को अपशब्द भी बोल देता है। वो सोचता है कि मेरे बराबर कोई नहीं है। साहिब समझा रहे हैं—

अति के गर्व न होय भाई। गर्वहि ते पुनि सर्व नशायी ॥
अभिमानी नहिं छूटे कबहूँ। बहु विलक्षण ज्ञानी होय तबहूँ ॥
भगली दंभ नितही मन माहीं। निकट साँच कछु आवे नाहीं ॥
हम हम हम करत सो डोलै। काहू से सीधा नहिं बोलै ॥
रूपवन्त रूप गरवावै। कोई मोसम दृष्टि न आवै ॥
धन कुल विद्या गर्बाना। अनी ऊँच ज्ञानी विखराना ॥
अहै भूप राजा अभिमानी। आपेही को सरवस जानी ॥
है योगी योग गर्व धारै। बड़े बड़े सिद्धि काल गहि मारै ॥