Skip to content
SarvaKosh
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

Page 14 of 120

Read in context
Page 14

हालात में शरीर के मिटने के साथ यह भी मिटेगा; परन्तु ऐसा होता नहीं। कुछ अन्य पंथों का मत है कि मन और आत्मा अलग-अलग चीज़ हैं। केवल मानव शरीर के अन्दर ही वे एक-दूसरे से बँध जाते हैं। मन की संगत के कारण ही आत्मा को पीड़ा उठानी पड़ती है; लेकिन जब किसी सद्गुरु के आशीर्वाद से यह गाँठ खुल जाती है तो आत्मा, जो ईश्वर का अंश है, वापिस अपने घर चली जाती है, जबकि मन, जो ब्रह्म का अंश है, त्रिकुटी में वापिस अपने स्थान पर चला जाता है।

यदि इन विभिन्न पंथों की विचारधाराओं का विचारपूर्वक अध्ययन किया जाए तो यही पता चलेगा कि मन के बारे में उनकी विचारधारा में कहीं-न-कहीं त्रुटि है। कहीं भी मन का स्वरूप स्पष्ट नहीं हो रहा। आओ, देखते हैं कि साहिब क्या कह रहे हैं, इस विषय में।

तन मन कौ खोजहु रे भाई, तन छुटे मन कहाँ समाई।
सनक सनन्दन ये दोनामां, भगति करी मन उनहुँ न जाना।
शिव विरंचि नारद मुनि ज्ञानी, मन की गति उनहुँ नहिं जानी।
ध्रुव प्रह्लाद विभीषण शेषा, तन भीतरी मन उनहुँ न देखा॥

कबीर साहिब कह रहे हैं कि हे भाईयो! इस मन की खोज करो। सोचो तो ज़रा कि तन के छूटने पर यह मन कहाँ चला जाता है! इस विषय को सनक, सनन्दन, जयदेव, नामदेव आदि महान् भक्त भी समझ नहीं पाए। इतना ही नहीं, 'शिव विरंचि नारद मुनि ज्ञानी, मन की गति उनहुँ नहिं जानी' यह कबीर साहिब क्या कह रहे हैं? ज़रा सोचो तो! कितनी बड़ी बात कह रहे हैं! इस विषय पर गम्भीरता से विचार करना होगा। लेकिन यहीं नहीं रुकेंगे, पूरी बात को समझना है।

अच्छा, यह तो समझ में आ रहा है कि यह मन जीवात्मा को ठगने के लिए एक निपुण ठग की तरह है। इसने बड़े-बड़े मुनियों, योगियों आदि को भी धोखा दिया है। योगियों ने अनेक प्रकार से ध्यान किया, अनेक प्रकार के जप-तप किये, शरीर को कष्ट दिया, शरीर सुखा