मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextहोता है। तो मैंने उससे पूछा कि क्या कीमत है हाथी की? कहा—पाँच से छः लाख। वो बोला कि हथिनी की कीमत 5 से 7 लाख है। हथिनी मँहगी है। मैंने पूछा कि क्यों है मँहगी? कहा कि बच्चा देती है। कुछ साल में बड़ा हो जाता है। मैं छोटी हथिनियों को लाता हूँ, अपने बगीचे में पत्तियाँ खिलाकर जवान करता हूँ। वो खुद खा लेती हैं। ज्यादा खर्चा भी नहीं है। फिर वे बच्चे देती हैं। तब मैं उन्हें बेचता हूँ।
हाथी के चमड़े, दाँतों आदि से बड़े काम होते हैं। हाथी के दाँतों से चूड़ियाँ बनती हैं, जो शादियों आदि अवसरों पर पहनते हैं। तो उसने कहा कि बड़ी कीमती बिकती हैं।
इंसान ने हाथी को इसलिए रखा कि उससे काम करवाना है; कुछ मतलब है। मन ने इसलिए इस आत्मा को बाँधा हुआ है कि उससे अपने काम करवाने हैं, दुनिया को चलाना है। रूह को मन ने बाँधकर रखा है। क्यों बाँधा? जैसे इंसान ने अपने मतलब के लिए घोड़े को बाँधा है, गाय को बाँधा है।
मन ने आत्मा को किस फँदे में बाँधा है? मेरा बेटा, मेरा भाई आदि के फँदों में आत्मा को बाँध दिया गया है। रूह अपने को नहीं जान पा रही है। विरोधी ताकतें रूह को बाँधे हुए हैं। आत्मदेव बुरे बँधनों में हैं। इसलिए साहिब कह रहे हैं—
बहु बंधन ते बाँधिया, एक विचारा जीव।
जिसने बाँधा है, बड़े यत्न से बाँधा है। अब बैल को उसका मालिक नहीं जाने देना चाहता है। भैंसे आदि किसी को नहीं जाने दे रहा है कोई। अच्छी तरह से बाँधकर रखे हुए हैं सब अपने-अपने स्वार्थों के लिए अपने-अपने पशुओं को। इस तरह—
बहु बंधन ते बाँधिया, एक विचारा जीव।
जीव विचारा क्या करे, जो न छुड़ावे पीव॥
आत्मदेव को बहुत बंधनों में कैद किया गया है। इसकी पेश नहीं चल रही है। यह नहीं निकल पा रहा है जालिम मन के बंधन से। इससे