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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

Page 738 of 2566

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मेढकको शाप देकर वे तुरंत दूसरी जगह निवास करनेके लिये चले गये। सर्वव्यापी अग्निने अपने-आपको प्रकट नहीं किया ।। २९ ।।

देवास्त्वनुग्रहं चक्रुर्मण्डूकानां भृगूत्तम ।
यत्तच्छृणु महाबाहो गदतो मम सर्वशः ।। ३० ।।

भृगुश्रेष्ठ! महाबाहो! उस समय देवताओंने मेढकोंपर जो कृपा की, वह सब बता रहा हूँ, सुनो ।। ३० ।।

देवा ऊचुः

अग्निशापादजिह्वापि रसज्ञानबहिष्कृताः ।
सरस्वतीं बहुविधां यूयमुच्चारयिष्यथ ।। ३१ ।।

देवता बोले—मेढको! अग्निदेवके शापसे तुम्हारे जिह्वा नहीं होगी; अतः तुम रसोंके ज्ञानसे शून्य रहोगे तथापि हमारी कृपासे तुम नाना प्रकारकी वाणीका उच्चारण कर सकोगे ।। ३१ ।।

बिलवासं गतांश्चैव निराहारानचेतसः ।
गतासूनपि संशुष्कान् भूमिः संधारयिष्यति ।। ३२ ।।
तमोघनायामपि वै निशायां विचरिष्यथ ।

बिलमें रहते समय तुम आहार न मिलनेके कारण अचेत और निष्प्राण होकर सूख जाओगे तो भी भूमि तुम्हें धारण किये रहेगी—वर्षाका जल मिलनेपर तुम पुनः जीवित हो उठोगे। घने अन्धकारसे भरी हुई रात्रिमें भी तुम विचरते रहोगे ।। ३२ १/२ ।।

इत्युक्त्वा तांस्ततो देवाः पुनरेव महीमिमाम् ।। ३३ ।।
परीयुर्ज्वलनस्यार्थे न चाविन्दन् हुताशनम् ।

मेढकोंसे ऐसा कहकर देवता पुनः अग्निकी खोजके लिये इस पृथ्वीपर विचरने लगे; किंतु वे अग्निदेवको कहीं उपलब्ध न कर सके ।। ३३ १/२ ।।

अथ तान् द्विरदः कश्चित् सुरेन्द्रद्विरदोपमः ।। ३४ ।।
अश्वत्थस्थोऽग्निरित्येवमाह देवान् भृगूद्वह ।

भृगुश्रेष्ठ! तदनन्तर देवराज इन्द्रके ऐरावतकी भाँति कोई विशालकाय गजराज देवताओंसे बोला—‘अश्वत्थ अग्निरूप है’ ।। ३४ १/२ ।।

शशाप ज्वलनः सर्वान् द्विरदान् क्रोधमूर्च्छितः ।। ३५ ।।
प्रतीपा भवतां जिह्वा भवित्रीति भृगूद्वह ।

भृगुकुलभूषण! यह सुनकर अग्निदेव क्रोधसे विह्वल हो उठे और उन्होंने समस्त हाथियोंको शाप देते हुए कहा—‘तुमलोगोंकी जिह्वा उलटी हो जायगी’ ।। ३५ १/२ ।।

इत्युक्त्वा निःसृतोऽश्वत्थादग्निर्वारणसूचितः ।
प्रविवेश शमीगर्भमथ वह्निः सुषुप्सया ।। ३६ ।।