महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextइदं गवां प्रभवविधानमुत्तमं
पठन् सदाशुचिरपि मंगलप्रियः ।
विमुच्यते कलिकलुषेण मानवः
श्रियं सुतान् धनपशुमाप्नुयात् सदा ॥ ३२ ॥
गौओंकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाली इस उत्तम कथाका सदा पाठ करनेवाला मनुष्य अपवित्र हो तो भी मंगलप्रिय हो जाता है और कलियुगके सारे दोषोंसे छूट जाता है। इतना ही नहीं, उसे पुत्र, लक्ष्मी, धन तथा पशु आदिकी सदा प्राप्ति होती है ॥ ३२ ॥
हव्यं कव्यं तर्पणं शान्तिकर्म
यानं वासो वृद्धबालस्य तुष्टिः ।
एतान् सर्वान् गोप्रदाने गुणान् वै
दाता राजन्नाप्नुयाद् वै सदैव ॥ ३३ ॥
राजन्! गोदान करनेवालेको हव्य, कव्य, तर्पण और शान्तिकर्मका फल तथा वाहन, वस्त्र एवं बालकों और वृद्धोंको संतोष प्राप्त होता है। इस प्रकार ये सब गोदानके गुण हैं। दाता इन सबको सदा पाता ही है ॥ ३३ ॥
वैशम्पायन उवाच
पितामहस्याथ निशम्य वाक्यं
राजा सह भ्रातृभिराजमीढः ।
सुवर्णवर्णानडुहस्तथा गाः
पार्थो ददौ ब्राह्मणसत्तमेभ्यः ॥ ३४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! पितामह भीष्मकी ये बातें सुनकर अजमीढवंशी राजा युधिष्ठिर और उनके भाइयोंने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सोनेके समान रंगवाले बैलों और उत्तम गौओंका दान किया ॥ ३४ ॥
तथैव तेभ्योऽपि ददौ द्विजेभ्यो
गवां सहस्राणि शतानि चैव ।
यज्ञान् समुद्दिश्य च दक्षिणार्थे
लोकान् विजेतुं परमां च कीर्तिम् ॥ ३५ ॥
इसी प्रकार यज्ञोंकी दक्षिणाके लिये, पुण्यलोकोंपर विजय पानेके लिये तथा संसारमें अपनी उत्तम कीर्तिका विस्तार करनेके लिये राजाने उन्हीं ब्राह्मणोंको सैकड़ों और हजारों गौएँ दान कीं ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रभवकथने
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥