महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextरूपं चक्षुर्न गृह्णाति त्वक् स्पर्शं नावबुध्यते ॥ १४ ॥
न श्रोत्रं बुध्यते शब्दं मया हीनं कथंचन ।
प्रवरं सर्वभूतानामहमस्मि सनातनम् ॥ १५ ॥
एक बार मनने इन्द्रियोंसे कहा—मेरी सहायताके बिना नासिका सूँघ नहीं सकती, जीभ रसका स्वाद नहीं ले सकती, आँख रूप नहीं देख सकती, त्वचा स्पर्शका अनुभव नहीं कर सकती और कानोंको शब्द नहीं सुनायी दे सकता। इसलिये मैं सब भूतोंमें श्रेष्ठ और सनातन हूँ ॥ १४-१५ ॥
अगारणीव शून्यानि शान्तार्चिष इवाग्नयः ।
इन्द्रियाणि न भासन्ते मया हीनानि नित्यशः ॥ १६ ॥
‘मेरे बिना समस्त इन्द्रियाँ बुझी लपटोंवाली आग और सूने घरकी भाँति सदा श्रीहीन जान पड़ती हैं ॥ १६ ॥
काष्ठानीवार्द्रशुष्काणि यतमानैरपीन्द्रियैः ।
गुणार्थान् नाधिगच्छन्ति मामृते सर्वजन्तवः ॥ १७ ॥
संसारके सभी जीव इन्द्रियोंके यत्न करते रहनेपर भी मेरे बिना उसी प्रकार विषयोंका अनुभव नहीं कर सकते, जिस प्रकार कि सूखे-गीले काष्ठ कोई अनुभव नहीं कर सकते ॥ १७ ॥
इन्द्रियाण्यूचुः
एवमेतद् भवेत् सत्यं यथैतन्मन्यते भवान् ।
ऋतेऽस्मानस्मदर्थांस्त्वं भोगान् भुङ्क्ते भवान् यदि ॥ १८ ॥
यह सुनकर इन्द्रियोंने कहा—महोदय! यदि आप भी हमारी सहायता लिये बिना ही विषयोंका अनुभव कर सकते तो हम आपकी इस बातको सच मान लेतीं ॥ १८ ॥
यद्यस्मासु प्रलीनेषु तर्पणं प्राणधारणम् ।
भोगान् भुङ्क्ते भवान् सत्यं यथैतन्मन्यते तथा ॥ १९ ॥
हमारा लय हो जानेपर भी आप तृप्त रह सकें, जीवन धारण कर सकें और सब प्रकारके भोग भोग सकें तो आप जैसा कहते और मानते हैं, वह सब सत्य हो सकता है ॥ १९ ॥
अथवास्मासु लीनेषु तिष्ठत्सु विषयेषु च ।
यदि संकल्पमात्रेण भुङ्क्ते भोगान् यथार्थवत् ॥ २० ॥
अथ चेन्मन्यसे सिद्धिमस्मदर्थेषु नित्यदा ।
घ्राणेन रूपमादत्स्व रसमादत्स्व चक्षुषा ॥ २१ ॥
श्रोत्रेण गन्धानादत्स्व स्पर्शनादत्स्व जिह्वया ।
त्वचा च शब्दमादत्स्व बुद्ध्या स्पर्शमथापि च ॥ २२ ॥