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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

Page 1688 of 2566

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Page 1688

पास गयी और बोली—'भगवन्! प्रसन्न होइये' ॥ १९ ॥
ततः प्राणः प्रादुरभूद् वाचमाप्याययन् पुनः।
तस्मादुच्छ्वासमासाद्य न वाग् वदति कर्हिचित् ॥ २० ॥
तब वाणीको पुष्ट-सा करता हुआ पुनः प्राण प्रकट हुआ। इसीलिये उच्छ्वास लेते समय वाणी कभी कोई शब्द नहीं बोलती है ॥ २० ॥
घोषिणी जातनिर्घोषा नित्यमेव प्रवर्तते ।
तयोरपि च घोषिण्या निर्घोषैव गरीयसी ॥ २१ ॥
वाणी दो प्रकारकी होती है—एक घोषयुक्त (स्पष्ट सुनायी देनेवाली) और दूसरी घोषरहित, जो सदा सभी अवस्थाओंमें विद्यमान रहती है। इन दोनोंमें घोषयुक्त वाणीकी अपेक्षा घोषरहित ही श्रेष्ठतम है (क्योंकि घोषयुक्त वाणीको प्राणशक्तिकी अपेक्षा रहती है और घोषरहित उसकी अपेक्षाके बिना भी स्वभावतः उच्चरित होती रहती है) ॥ २१ ॥
गौरिव प्रसवत्यर्थान् रसमुत्तमशालिनी ।
सततं स्यन्दते ह्येषा शाश्वतं ब्रह्मवादिनी ॥ २२ ॥
दिव्यादिव्यप्रभावेण भारती गौः शुचिस्मिते ।
एतयोरन्तरं पश्य सूक्ष्मयोः स्यन्दमानयोः ॥ २३ ॥
शुचिस्मिते! घोषयुक्त (वैदिक) वाणी भी उत्तम गुणोंसे सुशोभित होती है। वह दूध देनेवाली गायकी भाँति मनुष्योंके लिये सदा उत्तम रस झरती एवं मनोवांछित पदार्थ उत्पन्न करती है और ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषद्वाणी (शाश्वत ब्रह्म)-का बोध करानेवाली है। इस प्रकार वाणीरूपी गौ दिव्य और अदिव्य प्रभावसे युक्त है। दोनों ही सूक्ष्म हैं और अभीष्ट पदार्थका प्रस्रव करने-वाली हैं। इन दोनोंमें क्या अन्तर है, इसको स्वयं देखो ॥ २२-२३ ॥

ब्राह्मण्युवाच

अनुत्पन्नेषु वाक्येषु चोद्यमाना विवक्षया ।
किन्नु पूर्वं तदा देवी व्याजहार सरस्वती ॥ २४ ॥
ब्राह्मणीने पूछा— नाथ! जब वाक्य उत्पन्न नहीं हुए थे, उस समय कुछ कहनेकी इच्छासे प्रेरित की हुई सरस्वती देवीने पहले क्या कहा था? ॥ २४ ॥

ब्राह्मण उवाच

प्राणेन या सम्भवते शरीरे
 प्राणादपानं प्रतिपद्यते च।
उदानभूता च विसृज्य देहं
 व्यानेन सर्वं दिवमावृणोति ॥ २५ ॥
ततः समाने प्रतितिष्ठतीह