महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextनिमीलिते भूतपतौ नष्टसूर्य इवाभवत् ॥ २८ ॥
सब लोग अनमने हो गये, सबके ऊपर त्रास छा गया। भूतनाथके नेत्र बंद कर लेनेपर इस संसारकी वैसी ही दशा हो गयी, मानो सूर्यदेव नष्ट हो गये हैं ॥ २८ ॥
ततो वितिमिरो लोकः क्षणेन समपद्यत ।
ज्वाला च महती दीप्ता ललाटात् तस्य निःसृता ॥ २९ ॥
तदनन्तर क्षणभरमें सारे जगत्का अन्धकार दूर हो गया। भगवान् शिवके ललाटसे अत्यन्त दीप्तिशालिनी महाज्वाला प्रकट हो गयी ॥ २९ ॥
तृतीयं चास्य सम्भूतं नेत्रमादित्यसंनिभम् ।
युगान्तसदृशं दीप्तं येनासौ मथितो गिरिः ॥ ३० ॥
उनके ललाटमें आदित्यके समान तेजस्वी तीसरे नेत्रका आविर्भाव हो गया। वह नेत्र प्रलयाग्निके समान देदीप्यमान हो रहा था। उस नेत्रसे प्रकट हुई ज्वालाने उस पर्वतको जलाकर मथ डाला ॥ ३० ॥
ततो गिरिसुता दृष्ट्वा दीप्ताग्निसदृशेक्षणम् ।
हरं प्रणम्य शिरसा ददर्शायतलोचना ॥ ३१ ॥
तब महादेवजीको प्रज्वलित अग्निके सदृश तीसरे नेत्रसे युक्त हुआ देख गिरिराजनन्दिनी विशाललोचना उमाने सिरसे प्रणाम करके उनकी ओर चकित दृष्टिसे देखा ॥ ३१ ॥
दह्यमाने वने तस्मिन् ससालसरलद्रुमे ।
सचन्दनवरे रम्ये दिव्यौषधिविदीपिते ॥ ३२ ॥
साल और सरल आदि वृक्षोंसे युक्त, श्रेष्ठ चन्दन-वृक्षसे सुशोभित तथा दिव्य ओषधियोंसे प्रकाशित उस रमणीय वनमें आग लग गयी थी और वह सब ओरसे जल रहा था ॥ ३२ ॥
मृगयूथैर्द्रुतैर्भीतैर्हरपार्श्वमुपागतैः ।
शरणं चाप्यविन्दद्भिस्तत् सदः संकुलं बभौ ॥ ३३ ॥
भयभीत मृगोंके झुंडोंको जब कहीं भी शरण न मिली, तब वे भागते हुए महादेवजीके पास आ पहुँचे। उनसे वह सारा सभास्थल भर गया और उसकी अपूर्व शोभा होने लगी ॥ ३३ ॥
ततो नभस्पृग्ज्वालो विद्युल्लोलाग्निरुल्बणः ।
द्वादशादित्यसदृशो युगान्ताग्निरिवापरः ॥ ३४ ॥
वहाँ लगी हुई आगकी लपटें आकाशको चूम रही थीं। विद्युत्के समान चंचल हुई वह आग बड़ी भयानक प्रतीत हो रही थी, वह बारह सूर्योंके समान प्रकाशित होकर दूसरी प्रलयाग्निके समान प्रतीत होती थी ॥ ३४ ॥
क्षणेन तेन निर्दग्धो हिमवान्भवन्नगः ।