महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextजानते हैं तो मुझे बताइये ॥ ३३ ॥
भीष्म उवाच
यस्मिन् भयार्दितः सम्यक् क्षेमं विन्दत्यपि क्षणम् ।
स स्वर्गजित्तमोऽस्माकं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! भयसे डरा हुआ मनुष्य जिसके पास जाकर एक क्षणके लिये भी भलीभाँति शान्ति पा लेता है, वही हमलोगोंमें स्वर्गलोककी प्राप्तिका सबसे बड़ा अधिकारी है, यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ ३४ ॥
त्वमेव प्रीतिमांस्तस्मात् कुरूणां कुरुसत्तम ।
भव राजा जय स्वर्गं सतो रक्षासतो जहि ॥ ३५ ॥
इसलिये कुरुश्रेष्ठ! तुम्हीं प्रसन्नतापूर्वक कुरुदेशकी प्रजाके राजा बनो। सत्पुरुषोंकी रक्षा तथा दुष्टोंका संहार करो और इस प्रकार अपने कर्तव्यका पालन करके स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त कर लो ॥ ३५ ॥
अनु त्वां तात जीवन्तु सुहृदः साधुभिः सह ।
पर्जन्यमिव भूतानि स्वादुद्रुममिव द्विजाः ॥ ३६ ॥
तात! जैसे सब प्राणी मेघके और पक्षी स्वादिष्ट फलवाले वृक्षके सहारे जीवन-निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार साधु पुरुषोंसहित समस्त सुहृद्गण तुम्हारे आश्रयमें रहकर अपनी जीविका चलावें ॥ ३६ ॥
धृष्टं शूरं प्रहर्तारमनृशंसं जितेन्द्रियम् ।
वत्सलं संविभक्तारमुपजीवन्ति तं नराः ॥ ३७ ॥
जो राजा निर्भय, शूरवीर, प्रहार करनेमें कुशल, दयालु, जितेन्द्रिय, प्रजावत्सल और दानी होता है, उसीका आश्रय लेकर मनुष्य जीवन-निर्वाह करते हैं ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥