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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

Page 515 of 2450

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Page 515

भारत! राजाद्वारा सुरक्षित हुई प्रजा यहाँ जिस धर्मका आचरण करती है, उसका चौथा भाग राजाको भी मिल जाता है ॥ ६ ॥

यदधीते यद् ददाति यज्जुहोति यदर्चति ।
राजा चतुर्थभाक् तस्य प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ ७ ॥
प्रजा जो स्वाध्याय, जो दान, जो होम और जो पूजन करती है, उन पुण्य कर्मोंका एक चौथाई भाग उस प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करनेवाला नरेश प्राप्त कर लेता है ॥ ७ ॥

यद् राष्ट्रेऽकुशलं किञ्चिद् राज्ञोऽरक्षयतः प्रजाः ।
चतुर्थं तस्य पापस्य राजा भारत विन्दति ॥ ८ ॥
भरतनन्दन! यदि राजा प्रजाकी रक्षा नहीं करता तो उसके राज्यमें प्रजा जो कुछ भी अशुभ कार्य करती है, उस पापकर्मका एक चौथाई भाग राजाको भोगना पड़ता है ॥ ८ ॥

अप्याहुः सर्वमेवेति भूयोऽर्धमिति निश्चयः ।
कर्मणः पृथिवीपाल नृशंसोऽनृतवागपि ॥ ९ ॥
पृथ्वीपते! कुछ लोगोंका मत है कि उपर्युक्त अवस्थामें राजाको पूरे पापका भागी होना पड़ता है, और कुछ लोगोंका यह निश्चय है कि उसको आधा पाप लगता है। ऐसा राजा क्रूर और मिथ्यावादी समझा जाता है ॥ ९ ॥

तादृशात् किल्बिषाद् राजा शृणु येन प्रमुच्यते ।
प्रत्याहर्तुमशक्यं स्याद् धनं चोरैर्हृतं यदि ।
तत् स्वकोशात् प्रदेयं स्यादशक्तेनोपजीवतः ॥ १० ॥
ऐसे पापसे राजाको किस उपायसे छुटकारा मिलता है, वह बताता हूँ, सुनो। चोरों या लुटेरोंने यदि किसीके धनका अपहरण कर लिया हो और राजा पता लगाकर उस धनको लौटा न सके तो उस असमर्थ नरेशको चाहिये कि वह अपने आश्रयमें रहनेवाले उस मनुष्यको उतना ही धन राजकीय खजानेसे दे दे ॥ १० ॥

सर्ववर्णैः सदा रक्ष्यं ब्रह्मस्वं ब्राह्मणा यथा ।
न स्थेयं विषये तेन योऽपकुर्याद् द्विजातिषु ॥ ११ ॥
सभी वर्णके लोगोंको ब्राह्मणोंके धनकी भी रक्षा उसी प्रकार करनी चाहिये जिस प्रकार स्वयं ब्राह्मणोंकी। जो ब्राह्मणोंको कष्ट पहुँचाता हो, उसे राजाको अपने राज्यमें नहीं रहने देना चाहिये ॥ ११ ॥

ब्रह्मस्वे रक्ष्यमाणे तु सर्वं भवति रक्षितम् ।
तस्मात् तेषां प्रसादेन कृतकृत्यो भवेन्नृपः ॥ १२ ॥
ब्राह्मणके धनकी रक्षा की जानेपर ही सब कुछ रक्षित हो जाता है; क्योंकि उन ब्राह्मणोंकी कृपासे राजा कृतार्थ हो जाता है ॥ १२ ॥

पर्जन्यमिव भूतानि महाद्रुममिव द्विजाः ।
नरास्तमुपजीवन्ति नृपं सर्वार्थसाधकम् ॥ १३ ॥