Skip to content
SarvaKosh
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

Page 358 of 2450

Read in context
Page 358

⬅ विषय-सूची (TOC)

तब दिव्य दृष्टि रखनेवाले देवर्षि नारदने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचारकर समस्त पाण्डवों तथा मरनेसे बचे हुए अन्य नरेशोंको सम्बोधित करके कहा— ॥ ७ ॥
प्राप्तकालं समाचक्षे भीष्मोऽयमनुयुज्यताम् ।
अस्तमेति हि गाङ्गेयो भानुमानिव भारत ॥ ८ ॥

महाभारत

भगवान् श्रीकृष्णका देवर्षि नारद एवं पाण्डवोंको लेकर शरशय्यास्थित भीष्मके निकट गमन

‘भरतनन्दन युधिष्ठिर तथा अन्य भूपालगण! मैं आप लोगोंको समयोचित कर्तव्य बता रहा हूँ। आपलोग गङ्गानन्दन भीष्मजीसे धर्म और ब्रह्मके विषयमें प्रश्न कीजिये, क्योंकि अब ये भगवान् सूर्यके समान अस्त होनेवाले हैं ॥ ८ ॥
अयं प्राणानुत्सिसृक्षुस्तं सर्वेऽभ्यनुपृच्छत ।
कृत्स्नान् हि विविधान् धर्मांश्चातुर्वर्ण्यस्य वेत्त्ययम् ॥ ९ ॥