महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextयत्र वै पापकृन्नीचो न महद् दुःखमर्च्छति ।
वर्धन्ते तत्र पापानि धर्मो ह्रसति च ध्रुवम् ॥ ३० ॥
जहाँ पाप करनेवाले नीचको महान् दुःख नहीं भोगना पड़ता है, वहाँ निश्चय ही पाप बढ़ता है और धर्मका ह्रास होता है ॥ ३० ॥
इति कारुण्यशीलस्तु विद्वान् वै ब्राह्मणोऽन्वशात् ।
इति चैवानुशिष्टोऽस्मि पूर्वैस्तात पितामहैः ॥ ३१ ॥
आश्वासयद्भिः सुभृशमनुक्रोशात् तथैव च ।
एतत् प्रथमकल्पेन राजा कृतयुगे जयेत् ॥ ३२ ॥
पिताजी! एक दयालु एवं विद्वान् ब्राह्मणने मुझे यह सब उपदेश दिया था। उस समय उसने कहा था कि 'तात सत्यवान्! मेरे पूर्वज पितामहोंने मुझे आश्वासन देते हुए अत्यन्त कृपापूर्वक ऐसी शिक्षा दी थी। इसलिये राजाको सत्ययुगमें जब कि धर्म अपने चारों चरणोंसे मौजूद रहता है, पूर्वोक्त प्रथम श्रेणीके (अहिंसामय) दण्डद्वारा ही प्रजाको वशमें करना चाहिये ॥ ३१-३२ ॥
पादोनेनापि धर्मेण गच्छेत् त्रेतायुगे तथा ।
द्वापरे तु द्विपादेन पादेन त्वधरे युगे ॥ ३३ ॥
'त्रेतायुग आनेपर धर्मका प्रचार एक चौथाई कम हो जाता है, द्वापरमें धर्मके दो ही पैर रह जाते हैं; परंतु कलियुगमें तो धर्मका चतुर्थ भाग ही शेष रह जाता है ॥
तथा कलियुगे प्राप्ते राज्ञो दुश्चरितेन ह ।
भवेत् कालविशेषेण कला धर्मस्य षोडशी ॥ ३४ ॥
'इस प्रकार कलियुग उपस्थित होनेपर राजाके दुर्व्यवहारसे तथा उस कालविशेषका प्रभाव पड़नेसे सम्पूर्ण धर्मकी सोलहवीं कलामात्र शेष रह जायगी ॥ ३४ ॥
अथ प्रथमकल्पेन सत्यवन् संकरो भवेत् ।
आयुः शक्तिं च कालं च निर्दिश्य तप आदिशेत् ॥ ३५ ॥
'सत्यवान्! यदि प्रथम श्रेणीके अहिंसात्मक दण्डसे धर्म और अधर्मका सम्मिश्रण होने लगे, तब दण्डनीय व्यक्तिकी आयु, शक्ति और कालको ध्यानमें रखते हुए राजा यथोचित दण्डके लिये आज्ञा प्रदान करे ॥ ३५ ॥
सत्याय हि यथा नेह जह्याद् धर्मफलं महत् ।
भूतानामनुकम्पार्थं मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ ३६ ॥
'स्वायम्भुव मनुने प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये धर्मका उपदेश किया है, जिससे इस जगत्में वह सत्यस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले धर्मके महान् फलसे वंचित न रह जाय' ॥ ३६ ॥