महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextजैसे पूर्वकालमें देवासुर-संग्राममें पूषा शोभा पाते थे, उसी प्रकार उस रजतनिर्मित ध्वजसे जयद्रथकी शोभा हो रही थी॥ २११/२॥
सौमदत्तेः पुनर्यूपो यज्ञशीलस्य धीमतः॥ २२॥
ध्वजः सूर्य इवाभाति सोमश्चात्र प्रदृश्यते।
सदा यज्ञमें लगे रहनेवाले बुद्धिमान् भूरिश्रवाके रथमें यूपका चिह्न बना था। वह ध्वज सूर्यके समान प्रकाशित होता था और उसमें चन्द्रमाका चिह्न भी दृष्टिगोचर होता था॥ २२१/२॥
स यूपः काञ्चनो राजन् सौमदत्तेर्विराजते॥ २३॥
राजसूये मखश्रेष्ठे यथा यूपः समुच्छ्रितः।
राजन्! जैसे यज्ञोंमें श्रेष्ठ राजसूयमें ऊँचा यूप सुशोभित होता है, भूरिश्रवाका वह सुवर्णमय यूप वैसे ही शोभा पा रहा था॥ २३१/२॥
शल्यस्य तु महाराज राजतो द्विरदो महान्॥ २४॥
केतुः काञ्चनचित्राङ्गैर्मयूरैरुपशोभितः।
स केतुः शोभयामास सैन्यं ते भरतर्षभ॥ २५॥
महाराज! शल्यके ध्वजमें चाँदीका महान् गजराज बना हुआ था। भरतश्रेष्ठ! वह ध्वज सुवर्णनिर्मित विचित्र अंगोंवाले मयूरोंसे सुशोभित था और आपकी सेनाकी शोभा बढ़ा रहा था॥ २४-२५॥
यथा श्वेतो महानागो देवराजचमूं तथा।
नागो मणिमयो राज्ञो ध्वजः कनकंसंवृतः॥ २६॥
जैसे श्वेत वर्णका महान् ऐरावत हाथी देवराजकी सेनाको सुशोभित करता है, उसी प्रकार राजा दुर्योधनका सुवर्णमण्डित ध्वज मणिमय गजराजके चिह्नसे उपलक्षित होता था॥ २६॥
किंकिणीशतसंह्लादो भ्राजंश्चित्रो रथोत्तमे।
व्यभ्राजत भृशं राजन् पुत्रस्तव विशाम्पते॥ २७॥
ध्वजेन महता संख्ये कुरूणामृषभस्तदा।
प्रजानाथ! वह विचित्र ध्वज दुर्योधनके उत्तम रथपर सैकड़ों क्षुद्रघंटिकाओंकी ध्वनिसे शोभायमान था। उस महान् ध्वजसे युद्धस्थलमें आपके पुत्र कुरुश्रेष्ठ दुर्योधनकी उस समय बड़ी शोभा हो रही थी॥ २७१/२॥
नवैते तव वाहिन्यामुच्छ्रिताः परमध्वजाः॥ २८॥
व्यदीपयंस्ते पृतनां युगान्तादित्यसंनिभाः।
ये नौ उत्तम ध्वज आपकी सेनामें बहुत ऊँचे थे और प्रलयकालके सूर्यके समान अपना प्रकाश फैलाते हुए आपकी सेनाको उद्भासित कर रहे थे॥ २८१/२॥