महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextमनुष्य डूबते समय अथवा ऊँचेसे नीचे गिरते समय भी शत्रुकि टाँग अवश्य पकड़े और ऐसा करते समय यदि अपना मूलोच्छेद हो जाय तो भी किसी प्रकार विषाद न करे। अच्छी जातिके घोड़े न तो थकते हैं और न शिथिल ही होते हैं। उनके इस कार्यको स्मरण करके अपने ऊपर रखे हुए युद्ध आदिके भारको उद्योगपूर्वक वहन करे ।। २० १/२ ।।
कुरु सत्त्वं च मानं च विद्धि पौरुषमात्मनः ।। २१ ।।
उद्ध्रावय कुलं मग्नं त्वत्कृते स्वयमेव हि ।
बेटा! तू धैर्य और स्वाभिमानका अवलम्बन कर। अपने पुरुषार्थको जान और तेरे कारण डूबे हुए इस वंशका तू स्वयं ही उद्धार कर ।। २१ १/२ ।।
यस्य वृत्तं न जल्पन्ति मानवा महदद्भुतम् ।। २२ ।।
राशिवर्धनमात्रं स नैव स्त्री न पुनः पुमान् ।
जिसके महान् और अद्भुत पुरुषार्थ एवं चरित्रकी सब लोग चर्चा नहीं करते हैं, वह मनुष्य अपने द्वारा जनसंख्याकी वृद्धिमात्र करनेवाला है। मेरी दृष्टिमें न तो वह स्त्री है और न पुरुष ही है ।। २२ १/२ ।।
दाने तपसि सत्ये च यस्य नोच्चरितं यशः ।। २३ ।।
विद्यायामर्थलाभे वा मातुरुच्चार एव सः ।
दान, तपस्या, सत्यभाषण, विद्या तथा धनोपार्जनमें जिसके सुयशका सर्वत्र बखान नहीं होता है, वह मनुष्य अपनी माताका पुत्र नहीं, मल-मूत्रमात्र ही है ।। २३ १/२ ।।
श्रुतेन तपसा वापि श्रिया वा विक्रमेण वा ।। २४ ।।
जनान् योऽभिभवत्यन्यान् कर्मणा हि स वै पुमान् ।
जो शास्त्रज्ञान, तपस्या, धन-सम्पत्ति अथवा पराक्रमके द्वारा दूसरे लोगोंको पराजित कर देता है, वह उसी श्रेष्ठ कर्मके द्वारा पुरुष कहलाता है ।। २४ १/२ ।।
न त्वेव जाल्मीं कापालीं वृत्तिमेषितुमर्हसि ।। २५ ।।
नृशंस्यामयशस्यां च दुःखं कापुरुषोचिताम् ।
तुझे हिजड़ों, कापालिकों, क्रूर मनुष्यों तथा कायरोंके लिये उचित भिक्षा आदि निन्दनीय वृत्तिका आश्रय कभी नहीं लेना चाहिये; क्योंकि वह अपयश फैलानेवाली और दुःखदायिनी होती है ।। २५ १/२ ।।
यमेनमभिनन्देयुरमित्राः पुरुषं कृशम् ।। २६ ।।
लोकस्य समवज्ञातं निहीनासनवाससम् ।
अहोलाभकरं हीनमल्पजीवनमल्पकम् ।। २७ ।।
नेदृशं बन्धुमासाद्य बान्धवः सुखमेधते ।