महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextइस तरह उनका सम्पूर्ण जगत्के क्षत्रियोंके साथ वैर हुआ था और उसी समय अमित तेजस्वी परशुरामजीने सारी पृथ्वी जीती थी ।। १५ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततश्चतुर्दशीं रामः समयेन महामनाः ।
दर्शयामास तान् विप्रान् धर्मराजं च सानुजम् ।। १६ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर चतुर्दशी तिथिको निश्चित समयपर महामना परशुरामजीने उस पर्वतपर रहनेवाले उन ब्राह्मणों तथा भाइयोंसहित युधिष्ठिरको दर्शन दिया ।। १६ ।।
स तमानर्च राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितः प्रभुः ।
द्विजानां च परां पूजां चक्रे नृपतिसत्तमः ।। १७ ।।
राजेन्द्र! उस समय प्रभावशाली नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरने भाइयोंके साथ श्रद्धापूर्वक भगवान् परशुरामजीकी पूजा की तथा अन्य ब्राह्मणोंका भी बहुत आदर-सत्कार किया ।। १७ ।।
अर्चित्वा जामदग्न्यं स पूजितस्तेन चोदितः ।
महेन्द्र उष्य तां रात्रिं प्रययौ दक्षिणामुखः ।। १८ ।।
जमदग्निनन्दन परशुरामजीकी पूजा करके स्वयं भी उनके द्वारा सम्मानित हो वे उन्हींकी आज्ञासे उस रातको महेन्द्रपर्वतपर ही रहे, फिर सबेरे उठकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये ।। १८ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कार्तवीर्योपाख्याने सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें कार्तवीर्योपाख्यानविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११७ ।।