महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context'आप कौन हैं? आपके सम्पूर्ण अंग निर्दोष एवं परम सुन्दर हैं। आप मेरे हृदयकी कामाग्निको बढ़ा रहे हैं। निष्पाप वीर! आप देवताओंके समान यहाँ आ पहुँचे हैं। मैं आपका परिचय पाना चाहती हूँ। आपका इस रनिवासमें आना कैसे सम्भव हुआ? आपको किसीने देखा कैसे नहीं? मेरा यह महल अत्यन्त सुरक्षित है और यहाँके राजाका शासन बड़ा कठोर है—वे अपराधियोंको बड़ा कठोर दण्ड देते हैं।' विदर्भराजकुमारीके ऐसा पूछनेपर नलने इस प्रकार उत्तर दिया ।। २०-२१ १/२ ।।
नल उवाच
नलं मां विद्धि कल्याणि देवदूतमिहागतम् ।। २२ ।।
देवास्त्वां प्राप्तुमिच्छन्ति शक्रोऽग्निर्वरुणो यमः ।
तेषामन्यतमं देवं पतिं वरय शोभने ।। २३ ।।
**नलने कहा—**कल्याणि! तुम मुझे नल समझो। मैं देवताओंका दूत बनकर यहाँ आया हूँ। इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम देवता तुम्हें प्राप्त करना चाहते हैं। शोभने! तुम उनमेंसे किसी एकको अपना पति चुन लो ।। २२-२३ ।।
तेषामेव प्रभावेण प्रविष्टोऽहमलक्षितः ।
प्रविशन्तं न मां कश्चिदपश्यन्नाप्यवारयत् ।। २४ ।।
उन्हीं देवताओंके प्रभावसे मैं इस महलके भीतर आया हूँ और मुझे कोई देख न सका है। भीतर प्रवेश करते समय न तो किसीने मुझे देखा है और न रोका ही है ।। २४ ।।
एतदर्थमहं भद्रे प्रेषितः सुरसत्तमैः ।
एतच्छ्रुत्वा शुभे बुद्धिं प्रकुरुष्व यथेच्छसि ।। २५ ।।
भद्रे! इसीलिये श्रेष्ठ देवताओंने मुझे यहाँ भेजा है। शुभे! इसे सुनकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा निश्चय करो ।। २५ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलस्य देवदौत्ये
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलके देवदूत बनकर दमयन्तीके पास जानेसे सम्बन्ध रखनेवाला पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५५ ।।