महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextएकोनविंशोऽध्यायः
पाण्डवोंके दुःखसे दुःखित द्रौपदीका भीमसेनके सम्मुख विलाप
द्रौपद्युवाच
इदं तु ते महद् दुःखं यत् प्रवक्ष्यामि भारत ।
न मेऽभ्यसूया कर्तव्या दुःखादेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ १ ॥
द्रौपदी बोली— भारत! अब जो दुःख मैं तुमसे निवेदन करनेवाली हूँ, वह तो मेरे लिये और भी महान् है। तुम इसके लिये मुझे दोष न देना। मैं दुःखसे व्यथित होनेके कारण ही यह सब कह रही हूँ ॥ १ ॥
सूदकर्मणि हीने त्वमसमे भरतर्षभ ।
ब्रुवन् बल्लवजातीयः कस्य शोकं न वर्धयेः ॥ २ ॥
भरतर्षभ! जो तुम्हारे लिये सर्वथा अयोग्य है, ऐसे रसोइयेके नीच काममें लगे हो और अपनेको ‘बल्लव’ जातिका मनुष्य बताते हो। इस अवस्थामें तुम्हें देखकर किसका शोक न बढ़ेगा? ॥ २ ॥
सूपकारं विराटस्य बल्लवं त्वां विदुर्जनाः ।
प्रेष्यत्वं समनुप्राप्तं ततो दुःखतरं नु किम् ॥ ३ ॥
लोग तुम्हें राजा विराटके रसोइये बल्लवके नामसे जानते हैं। तुम स्वामी होकर भी आज सेवककी दशामें पड़े हो। इससे बढ़कर महान् कष्ट मेरे लिये और क्या हो सकता है? ॥ ३ ॥
यदा महानसे सिद्धे विराटमुपतिष्ठसि ।
ब्रुवाणो बल्लवः सूदस्तदा सीदति मे मनः ॥ ४ ॥
जब पाकशालामें भोजन बना लेनेपर तुम विराटकी सेवामें उपस्थित होते हो और कहते हो—‘महाराज! बल्लव रसोइया आपको भोजनके लिये बुलाने आया है’, तब यह सब सुनकर मेरा मन दुःखित हो जाता है ॥ ४ ॥
यदा प्रहृष्टः सम्राट् त्वां संयोधयति कुञ्जरैः ।
हसन्त्यन्तःपुरे नार्यो मम तूद्विजते मनः ॥ ५ ॥
जब विराटनरेश प्रसन्न होकर तुम्हें हाथियोंसे लड़ाते हैं, उस समय रनिवासकी दूसरी स्त्रियाँ तो हँसती हैं और मेरा हृदय शोकसे व्याकुल हो उठता है ॥
शार्दूलैर्महिषैः सिंहैरागारे योध्यसे यदा ।
कैकेय्याः प्रेक्षमाणायास्तदा मे कश्मलं भवेत् ॥ ६ ॥