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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

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चतुर्थोऽध्यायः

धौम्यका पाण्डवोंको राजाके यहाँ रहनेका ढंग बताना और सबका अपने-अपने अभीष्ट स्थानोंको जाना

युधिष्ठिर उवाच

कर्माण्युक्तानि युष्माभिर्यानि यानि करिष्यथ ।
मम चापि यथा बुद्धिरुचिता विधिनिश्चयात् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**विराटके यहाँ रहकर तुम्हें जो-जो कार्य करने हैं, वे सब तुमने बताये। मुझे भी अपनी बुद्धिके अनुसार जो कार्य उचित प्रतीत हुआ, वह कह चुका। जान पड़ता है, विधाताका यही निश्चय है ॥ १ ॥

पुरोहितोऽयमस्माकमग्निहोत्राणि रक्षतु ।
सूदपौरोगवैः सार्द्धं द्रुपदस्य निवेशने ॥ २ ॥
इन्द्रसेनमुखाश्चैमे रथानादाय केवलान् ।
यान्तु द्वारवतीं शीघ्रमिति मे वर्तते मतिः ॥ ३ ॥
अब मेरी सलाह यह है कि ये पुरोहित धौम्यजी रसोइयों तथा पाकशालाध्यक्षके साथ राजा द्रुपदके घर जाकर रहें और वहाँ हमारे अग्निहोत्रकी अग्नियोंकी रक्षा करें तथा ये इन्द्रसेन आदि सेवकगण केवल रथोंको लेकर शीघ्र यहाँसे द्वारकाको चले जायँ ॥ २-३ ॥

इमाश्च नार्यो द्रौपद्याः सर्वाश्च परिचारिकाः ।
पाञ्चालानेव गच्छन्तु सूदपौरोगवैः सह ॥ ४ ॥
और ये जो द्रौपदीकी सेवा करनेवाली स्त्रियाँ हैं, वे सब रसोइयों और पाकशालाध्यक्षके साथ पांचालदेशको ही चली जायँ ॥ ४ ॥

सर्वैरपि च वक्तव्यं न प्राज्ञायन्त पाण्डवाः ।
गता ह्यस्मानपाहाय सर्वे द्वैतवनादिति ॥ ५ ॥
वहाँ सब लोग यही कहें—'हमें पाण्डवोंका कुछ भी पता नहीं है। वे सब द्वैतवनसे ही हमें छोड़कर न जाने कहाँ चले गये' ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं तेऽन्योन्यमामन्त्र्य कर्माण्युक्त्वा पृथक् पृथक् ।
धौम्यमामन्त्रयामासुः स च तान् मन्त्रमब्रवीत् ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार आपसमें एक-दूसरेकी सलाह लेकर और अपने पृथक्-पृथक् कर्म बतलाकर पाण्डवोंने पुरोहित धौम्यकी भी सम्मति ली। तब पुरोहित धौम्यने उन्हें इस प्रकार सलाह दी ॥ ६ ॥