महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context'पर्वत, वन तथा आकरोंसहित सम्पूर्ण दक्षिण दिशामें श्रीसीताजीका अनुसंधान करके जब हमलोग थक गये और यहाँ लौटनेका समय व्यतीत हो गया, तब हमें एक बहुत बड़ी गुफा दिखायी दी ।। ३८ ।।
प्रविशामो वयं तां तु बहुयोजनमायताम् ।
सान्धकारां सुविपिनां गहनां कीटसेविताम् ।। ३९ ।।
गत्वा सुमहदध्वानमादित्यस्य प्रभां ततः ।
दृष्टवन्तः स्म तत्रैव भवनं दिव्यमन्तरा ।। ४० ।।
'वह कई योजन लंबी थी। उसमें अन्धकार भरा हुआ था। उसके भीतर घने जंगल थे। उस गहन गुफामें बहुत-से कीड़े रहा करते थे। उसमें प्रवेश करके हमने बहुत दूरतकका रास्ता पार कर लिया। तत्पश्चात् सूर्यके प्रकाशका दर्शन हुआ। उसी गुफाके अंदर एक दिव्य भवन शोभा पा रहा था ।। ३९-४० ।।
मयस्य किल दैत्यस्य तदासीद् वेश्म राघव ।
तत्र प्रभावती नाम तपोऽतप्यत तापसी ।। ४१ ।।
'रघुनन्दन! वह सुन्दर भवन दैत्यराज मयका निवासस्थान बताया जाता है। उसमें प्रभावती नामकी एक तपस्विनी तप कर रही थी ।। ४१ ।।