महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context'पतिदेवके बिना किसी भी स्थानमें अकेली रहना मुझे बिलकुल पसंद नहीं है। मेरे स्वामी जब कभी कुटुम्बके कार्यसे कभी परदेश चले जाते हैं, उन दिनों मैं फूलोंका शृंगार नहीं धारण करती, अंगराग नहीं लगाती और निरन्तर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करती हूँ ।। ३० १/२ ।।
यच्च भर्ता न पिबति यच्च भर्ता न सेवते ।। ३१ ।।
यच्च नाश्नाति मे भर्ता सर्वं तद् वर्जयाम्यहम् ।
'मेरे पतिदेव जिस चीजको नहीं खाते, नहीं पीते अथवा नहीं सेवन करते, वह सब मैं भी त्याग देती हूँ ।। ३१ १/२ ।।
यथोपदेशं नियता वर्तमाना वराङ्गने ।। ३२ ।।
स्वलंकृता सुप्रयता भर्तुः प्रियहिते रता ।
ये च धर्माः कुटुम्बेषु श्वश्र्वा मे कथिताः पुरा ।। ३३ ।।
(अनुतिष्ठामि तत् सर्वं नित्यकालमतन्द्रिता ।।)
'सुन्दरी! शास्त्रोंमें स्त्रियोंके लिये जिन कर्तव्योंका उपदेश किया गया है, उन सबका मैं नियमपूर्वक पालन करती हूँ। अपने अंगोंको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित रखकर पूरी सावधानीके साथ मैं पतिके प्रिय एवं हित-साधनमें संलग्न रहती हूँ। मेरी सासने अपने परिवारके लोगोंके साथ बर्तावमें लानेयोग्य जो धर्म पहले मुझे बताये थे, उन सबका मैं निरन्तर आलस्यरहित होकर पालन करती हूँ ।। ३२-३३ ।।
भिक्षाबलिश्राद्धमिति स्थालीपाकांश्च पर्वसु ।
मान्यानां मानसत्कारा ये चान्ये विदिता मम ।। ३४ ।।
तान् सर्वाननुवर्तेऽहं दिवारात्रमतन्द्रिता ।
विनयान् नियमांश्चैव सदा सर्वात्मना श्रिता ।। ३५ ।।
'मैं दिन-रात आलस्य त्यागकर भिक्षा-दान, बलिवैश्वदेव, श्राद्ध, पर्वकालोचित स्थालीपाकयज्ञ, मान्य पुरुषोंका आदर-सत्कार, विनय, नियम तथा अन्य जो-जो धर्म मुझे ज्ञात हैं, उन सबका सब प्रकारसे उद्यत होकर पालन करती हूँ ।। ३४-३५ ।।
मृदून् सतः सत्यशीलान् सत्यधर्मानुपालिनः ।
आशीविषानिव क्रुद्धान् पतीन् परिचराम्यहम् ।। ३६ ।।
'मेरे पति बड़े ही सज्जन और मृदुल स्वभावके हैं। सत्यवादी तथा सत्यधर्मका निरन्तर पालन करनेवाले हैं; तथापि क्रोधमें भरे हुए विषैले सर्पोंसे जिस प्रकार लोग डरते हैं, उसी प्रकार मैं अपने पतियोंसे डरती हुई उनकी सेवा करती हूँ ।। ३६ ।।
पत्याश्रयो हि मे धर्मो मतः स्त्रीणां सनातनः ।
स देवः सा गतिर्नान्या तस्य का विप्रियं चरेत् ।। ३७ ।।
'मैं यह मानती हूँ कि पतिके आश्रयमें रहना ही स्त्रियोंका सनातन धर्म है। पति ही उनका देवता है और पति ही उनकी गति है। पतिके सिवा नारीका दूसरा कोई सहारा नहीं