महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 1516 of 2580
Read in contextमुष्णन्त्यत्र स्थिता ह्येते स्वर्गतो यज्ञयाजिनः ॥ १४ ॥
इस प्रकार ये पंद्रह देवोपम प्रभावशाली विनायक पृथक्-पृथक् पाँच-पाँच व्यक्तियोंके तीन दलोंमें विभक्त हैं। इस पृथ्वीपर ही रहकर स्वर्गलोकसे भी यज्ञकर्ता पुरुषोंकी यज्ञ-सामग्रीका अपहरण कर लेते हैं ॥ १४ ॥
तेषामिष्टं हरन्त्येते निघ्नन्ति च महद्धविः ।
स्पर्धया हव्यवाहानां निघ्नन्त्येते हरन्ति च ॥ १५ ॥
ये विनायकगण अग्नियोंके लिये अभीष्ट महान् हविष्यका अपहरण तो करते ही हैं, उसे नष्ट भी कर डालते हैं। अग्निगणोंके साथ लाग-डाँट रखनेके कारण ही ये हविष्यका अपहरण और विध्वंस करते हैं ॥ १५ ॥
बहिर्वेद्यां तदादानं कुशलैः सम्प्रवर्तितम् ।
तदेते नोपसर्पन्ति यत्र चाग्निः स्थितो भवेत् ॥ १६ ॥
इसीलिये यज्ञनिपुण विद्वानोंने यज्ञशालाकी बाह्य वेदीपर इन विनायकोंके लिये देयभाग रख देनेका नियम चालू किया है; क्योंकि जहाँ अग्निकी स्थापना हुई हो, उस स्थानके निकट ये विनायक नहीं जाते हैं ॥ १६ ॥
चितोऽग्निरुद्धहन् यज्ञं पक्षाभ्यां तान् प्रबाधते ।
मन्त्रैः प्रशमिता ह्येते नेष्टं मुष्णन्ति यज्ञियम् ॥ १७ ॥
मन्त्रद्वारा संस्कार करनेके पश्चात् प्रज्वलित अग्निदेव जिस समय आहुति ग्रहण करते हुए यज्ञका सम्पादन करते हैं, उस समय वे अपने दोनों पंखों (पार्श्ववर्ती शिखाओं) द्वारा उन विनायकोंको कष्ट पहुँचाते हैं (इसीलिये वे उनके पास नहीं फटकते)। मन्त्रोंद्वारा शान्त कर देनेपर वे विनायक यज्ञसम्बन्धी हविष्यका अपहरण नहीं कर पाते हैं ॥ १७ ॥
बृहदुक्थस्तपस्यैव पुत्रो भूमिमुपाश्रितः ।
अग्निहोत्रे हूयमाने पृथिव्यां सद्भिरीज्यते ॥ १८ ॥
इस पृथ्वीपर जब अग्निहोत्र होने लगता है, उस समय तप (पाञ्चजन्य)-के ही पुत्र बृहदुक्थ इस भूतलपर स्थित हो श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा पूजित होते हैं ॥ १८ ॥
रथन्तरश्च तपसः पुत्रोऽग्निः परिपठ्यते ।
मित्रविन्दाय वै तस्य हविरध्वर्यवो विदुः ॥ १९ ॥
मुमुदे परमप्रीतः सह पुत्रैर्महायशाः ॥ २० ॥
तपके पुत्र जो रथन्तर नामक अग्नि कहे जाते हैं, उनको दी हुई हवि मित्रविन्द देवताका भाग है, ऐसा यजुर्वेदी विद्वान् मानते हैं। महायशस्वी तप (पाञ्चजन्य) अपने इन सभी पुत्रोंके सहित अत्यन्त प्रसन्न हो आनन्दमग्न रहते हैं ॥ १९-२० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसोपाख्याने विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२० ॥