महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextविप्रवर! धुन्धु नामसे प्रसिद्ध एक महान् असुर है, जो तीनों लोकोंका संहार करनेके लिये घोर तपस्या कर रहा है। जो वीर उस महान् असुरका वध करेगा, उसका परिचय देता हूँ, सुनो ॥ ३१ १/२ ॥
राजा हि वीर्यवांस्तात इक्ष्वाकुरपराजितः ॥ ३२ ॥
बृहदश्व इति ख्यातो भविष्यति महीपतिः ।
तस्य पुत्रः शुचिर्दान्तः कुवलाश्व इति श्रुतः ॥ ३३ ॥
तात! इक्ष्वाकुकुलमें बृहदश्व नामसे प्रसिद्ध एक महापराक्रमी और किसीसे पराजित न होनेवाले राजा उत्पन्न होंगे। उनका पवित्र और जितेन्द्रिय पुत्र कुवलाश्वके नामसे विख्यात होगा ॥ ३२-३३ ॥
स योगबलमास्थाय मामकं पार्थिवोत्तमः ।
शासनात् तव विप्रर्षे धुन्धुमारो भविष्यति ।
एवमुक्त्वा तु तं विप्रं विष्णुरन्तरधीयत ॥ ३४ ॥
ब्रह्मर्षे! तुम्हारे आदेशसे वे नृपश्रेष्ठ कुवलाश्व ही मेरे योगबलका आश्रय लेकर धुन्धु राक्षसका वध करेंगे और लोकमें धुन्धुमार नामसे विख्यात होंगे। उत्तङ्कसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने
एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें धुन्धुमारोपाख्यानविषयक दो सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०१ ॥