महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context'देवेश्वर! नागराज वासुकि हमारे हितैषी हैं और सदा हमलोगोंके प्रिय कार्यमें लगे रहते हैं; अतः आप इनपर कृपा करें और इनके मनमें जो चिन्ताकी आग जल रही है, उसे बुझा दें' ।। ७ ।।
ब्रह्मोवाच
मयैव तद् वितीर्णं वै वचनं मनसामराः ।
एलापत्रेण नागेन यदस्याभिहितं पुरा ।। ८ ।।
ब्रह्माजीने कहा—'देवताओ! एलापत्र नागने वासुकिके समक्ष पहले जो बात कही थी, वह मैंने ही मानसिक संकल्पद्वारा उसे दी थी (मेरी ही प्रेरणासे एलापत्रने वे बातें वासुकि आदि नागोंके सम्मुख कही थीं) ।। ८ ।।
तत् करोत्वेष नागेन्द्रः प्राप्तकालं वचः स्वयम् ।
विनशिष्यन्ति ये पापा न तु ये धर्मचारिणः ।। ९ ।।
ये नागराज समय आनेपर स्वयं तदनुसार ही कार्य करें। जनमेजयके यज्ञमें पापी सर्प ही नष्ट होंगे, किंतु जो धर्मात्मा हैं वे नहीं ।। ९ ।।
उत्पन्नः स जरत्कारुस्तपस्युग्रे रतो द्विजः ।
तस्यैष भगिनीं काले जरत्कारुं प्रयच्छतु ।। १० ।।
अब जरत्कारु ब्राह्मण उत्पन्न होकर उग्र तपस्यामें लगे हैं। अवसर देखकर ये वासुकि अपनी बहिन जरत्कारुको उन महर्षिकी सेवामें समर्पित कर दें ।। १० ।।
एलापत्रेण यत् प्रोक्तं वचनं भुजगेन ह ।
पन्नगानां हितं देवास्तत् तथा न तदन्यथा ।। ११ ।।
देवताओ! एलापत्र नागने जो बात कही है, वही सर्पोंके लिये हितकर है। वही बात होनेवाली है। उससे विपरीत कुछ भी नहीं हो सकता ।। ११ ।।
सौतिरुवाच
एतच्छ्रुत्वा तु नागेन्द्रः पितामहवचस्तदा ।
संदिश्य पन्नगान् सर्वान् वासुकिः शापमोहितः ।। १२ ।।
स्वसारमुद्यम्य तदा जरत्कारुमृषिं प्रति ।
सर्पान् बहूञ्जरत्कारौ नित्ययुक्तान् समादधत् ।। १३ ।।
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**ब्रह्माजीकी बात सुनकर शापसे मोहित हुए नागराज वासुकिने सब सर्पोंको यह संदेश दे दिया कि मुझे अपनी बहिनका विवाह जरत्कारु मुनिके साथ करना है। फिर उन्होंने जरत्कारु मुनिकी खोजके लिये नित्य आज्ञामें रहनेवाले बहुत-से सर्पोंको नियुक्त कर दिया ।। १२-१३ ।।
जरत्कारुर्यदा भार्यामिच्छेद वरयितुं प्रभुः ।
शीघ्रमेत्य तदाख्येयं तन्नः श्रेयो भविष्यति ।। १४ ।।