महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextरक्षसा विप्रमुक्तोऽथ स नृपस्तद् वनं महत् ।
तेजसा रञ्जयामास संध्याभ्रमिव भास्करः ॥ २८ ॥
उस (मन्त्रपूत जलके प्रभावसे) राक्षसने भी राजाको छोड़ दिया। फिर तो भगवान् भास्कर जैसे संध्याकालीन बादलोंको अपनी (अरुण) किरणोंसे रँग देते हैं, उसी प्रकार राजाने अपने (सहज) तेजसे उस महान् वनको अनुरंजित कर दिया ॥ २८ ॥
प्रतिलभ्य ततः संज्ञामभिवाद्य कृताञ्जलिः ।
उवाच नृपतिः काले वसिष्ठमृषिसत्तमम् ॥ २९ ॥
तदनन्तर सचेत होनेपर राजा कल्माषपादने तत्काल ही मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा— ॥ २९ ॥
सौदासोऽहं महाभाग याज्यस्ते मुनिसत्तम ।
अस्मिन् काले यदिष्टं ते ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ३० ॥
'महाभाग मुनिश्रेष्ठ! मैं आपका यजमान सौदास हूँ। इस समय आपकी जो अभिलाषा हो, कहिये—मैं आपकी क्या सेवा करूँ?' ॥ ३० ॥
वसिष्ठ उवाच
वृत्तमेतद् यथाकालं गच्छ राज्यं प्रशाधि वै ।
ब्राह्मणं तु मनुष्येन्द्र मावमंस्थाः कदाचन ॥ ३१ ॥
**वसिष्ठजीने कहा—**नरेन्द्र! मेरी जो अभिलाषा थी, वह समयानुसार सिद्ध हो गयी। अब जाओ, अपना राज्य सँभालो। (आजसे फिर) कभी ब्राह्मणका अपमान न करना ॥ ३१ ॥
राजोवाच
नावमंस्ये महाभाग कदाचिद् ब्राह्मणानहम् ।
त्वन्निदेशे स्थितः सम्यक् पूजयिष्याम्यहं द्विजान् ॥ ३२ ॥
**राजा बोले—**महाभाग! मैं कभी ब्राह्मणोंका अपमान नहीं करूँगा। आपकी आज्ञाके पालनमें संलग्न हो (सदा) ब्राह्मणोंकी भलीभाँति पूजा करूँगा ॥ ३२ ॥
इक्ष्वाकूणां च येनाहमनृणः स्यां द्विजोत्तम ।
तत् त्वत्तः प्राप्तुमिच्छामि सर्ववेदविदां वर ॥ ३३ ॥
समस्त वेदवेत्ताओंमें अग्रगण्य द्विजश्रेष्ठ! मैं आपसे एक पुत्र प्राप्त करना चाहता हूँ, जिसके द्वारा मैं अपने इक्ष्वाकुवंशी पितरोंके ऋणसे उऋण हो सकूँ ॥ ३३ ॥
अपत्यमीप्सितं मह्यं दातुमर्हसि सत्तम ।
शीलरूपगुणोपेतमिक्ष्वाकुकुलवृद्धये ॥ ३४ ॥
साधुशिरोमणे! इक्ष्वाकुवंशकी वृद्धिके लिये आप मुझे ऐसी अभीष्ट संतान दीजिये, जो उत्तम स्वभाव, सुन्दर रूप और श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हो ॥ ३४ ॥