माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
by माधवकर
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेत । ( ७७ )
अथ पाण्डुरोगनिदानम् ।
पाण्डुरोगाः स्मृताः पञ्च वातपित्तकफैस्त्रयः ।
चतुर्थः सन्निपातेन पञ्चमो भक्षणान्मृदः ॥ १ ॥
मलसे प्रगट कृमिरोग पांडु ( पीलिया ) रोगको प्रगट करे है. इसी कारण कृमि-
रोगके अनन्तर पांडुरोगका निदान कहते हैं । तहां प्रथम पांडुरोगकी संख्यारूप
सम्प्राप्ति कहते हैं-१ वातका, २ पित्तका, ३ कफका, ४ सन्निपातका और ५ माटीके
खानेसे पांडुरोग पांच प्रकारका कहा है ॥
पांडुरोगके कारण और सम्प्राप्तिके लक्षण ।
व्यवायमम्लं लवणानि मद्यं मृदं दिवास्वप्नमतीव तीक्ष्णम् ।
निषेव्यमाणस्य विदूष्य रक्तं दोषास्त्वचं पाण्डुरतां नयन्ति॥२॥
अति मैथुन, खट्टे पदार्थका भोजन, नोनका पदार्थ खानेसे, बहुत मद्य पीनेसे,
मिट्टी खानेसे, दिनमें सोनेसे, अत्यन्त तीखा पदार्थ खानेसे इन कारणोंसे तीनों
दोष रुधिरको बिगाड देहकी त्वचाको पीले रंगकी कर देते हैं । इस जगह रुधिरका
तो उपलक्षणमात्र है, रक्तके कहनेसे त्वचा मांस इनको दूषित करते हैं यह
दृढबलने कहा है । हारीतने रसको दूष्य कहा है दोष नाम वातादिक और दूष्य
कहिये रसरक्तादि ॥
पांडुरोगके पूर्वरूप ।
त्वक्स्फोटनष्ठीवनगात्रसादमृद्भक्षणप्रेक्षणकूटशोथाः ।
विण्मूत्रपीतत्वमथाविपाको भविष्यतस्तस्य पुरःसराणि ॥ ३ ॥
त्वचाका फटना, मुखसे बारम्बार थूकना, अंगोंका जकडना, मिट्टी खानेकी
इच्छा, नेत्रोंपर सूजन, मल, मूत्र पीले हों, अन्नका परिपाक न होय ये लक्षण पांडु-
रोग प्रगट होनेवाला होय है तब होते हैं ॥
वातपांडुरोगके लक्षण ।
त्वङ्मूत्रनयनादीनां रूक्षकृष्णारुणात्मता ।
वातपाण्ड्वामये कम्पतोदानाहभ्रमादयः ॥ ४ ॥
वातके पांडुरोगमें त्वचा, मूत्र, नेत्र इनमें रूखापना कालापना और लाली होती
है तथा कंप, सुई छेदनकासा चुभना, अफरा, भ्रम, आदिशब्दसे भेद और शूला-
दिक भी होते हैं ॥