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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 87 of 404

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Page 87

भाषाटीकासमेत । ( ६९ )
अथाजीर्णनिदानम् ।
अग्निमांद्य और अजीर्ण इनका परस्पर कारण है, इसीसे अग्निमांद्यके पीछे
अजीर्णनिदानको कहते हैं-
आमं विदग्धं विष्टब्धं कफपित्तानिलैस्त्रिभिः । अजीर्णं केचि-
दिच्छन्ति चतुर्थं रसशेषतः ॥ १ ॥ अजीर्णं पञ्चमं केचिन्निर्दोषं
दिनपाकि च । वदन्ति षष्ठं चाजीर्णं प्राकृतं प्रतिवासरम् ॥ २ ॥
मनुष्यके कफसे आम, पित्तसे विदग्ध, वातसे विष्टब्ध ऐसे तीन प्रकारका
अजीर्णरोग होता है । और जो भोजन करा सो पक्व होय नहीं रस शेष रहे सो
रसशेषसे चतुर्थ अजीर्ण होय है । और रात्रि दिनमें जो आहार पचे और जिसमें
अफरा, हडफूटन कुछ होय यह पांचवां अजीर्ण किसीके मतसे है । और जो
नित्य ही स्वाभाविक अजीर्ण रहे अर्थात् विकृतिजन्य न होय उसको छठा अजीर्ण
कहते हैं इस अजीर्णके पचानेके अर्थ सुश्रुतमें वामपार्श्वशयनादिक उपाय कहे हैं
सो करने चाहिये ॥
भुक्त्वा शतपदं गच्छेदामपार्श्वेन संविशेत् । शब्दरूपरसस्पर्श-
गन्धांश्च मनसः प्रियान् ॥ भुक्तवानुपसेवेत तेनान्नं साधु तिष्ठति ३॥
भोजन करे पीछे सौ पेंड डोलना, बांई करवट शयन करना, अपने मनको जो
प्रिय शब्द, रूप, रस, स्पर्श, सुगन्ध उनको सेवन करना इस प्रकार करनेसे अन्न
भले प्रकार पचे है ॥
अजीर्णके कारण ।
अत्यम्बुपानाद्विषमाशनाच्च सन्धारणात् स्वप्नविपर्ययाच्च ।
कालेऽपि सात्म्यं लघु चापि भुक्तमन्नं न पाकं भजते नरस्य॥४॥
ईर्ष्याभयक्रोधपरिप्लुतेन लुब्धेन शुग्दैन्यनिपीडितेन ।
प्रद्वेषयुक्तेन च सेव्यमानमन्नं न सम्यक्परिपाकमेति ॥ ५ ॥
बहुत जल पीनेसे, भोजनके समयको छोड पीछे भोजन करनेसे, मल, मूत्र आदि
वेगोंके रोकनेसे, दिनमें सोनेसे, रातमें जागनेसे इन कारणोंसे भोजनके समय यदि
१ शंका-आमादिक तीनों अजीर्ण और रसशेषमें क्या भेद है? उत्तर-आम, विदग्ध, विष्टब्ध
ये तीनों अजीर्ण अन्नसे उत्पन्न होते हैं और रसशेष अजीर्ण आहारके रससे उत्पन्न होता है ॥