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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 81 of 404

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Page 81

भाषाटीकासमेत । (६३)
शंका-केवल गुदामें दोषोंके कोपसे बवासीर रोग होती है फिर सब देहमें
कृशत्व और काला हो जाना कैसे है ?
उत्तर।
पञ्चात्मा मारुतः पित्तं कफो गुदवलित्रये । सर्व एव प्रकुप्यन्ति
गुदजानां समुद्भवे ॥ ३३ ॥ तस्मादशांसि दुःखानि बहुव्याधि-
कराणि च । सर्वदेहोपतापीनि प्रायः कृच्छ्रतमानि च ॥ ३४ ॥
गुदाके तीन आंटोंमें बवासीरके मस्से प्रगट होनेसे पांच प्रकारकी वायु, पांच
प्रकारका पित्त, पांच प्रकारका कफ ये सब दोष कुपित होते हैं । प्राण, अपान,
समान, उदान और व्यान ये पांच प्रकारकी वायु, हृदय, गुदा, नाभि, कण्ठ और
सर्व देह ये इनके क्रमसे स्थान हैं तथा आलोचक, रंजक, साधक, पाचक, भ्राजक
इन भेदोंसे पित्त पांच प्रकारका है । इनके स्थान-आलोचक नेत्रोंमें, रञ्जक यकृत्
और प्लीहोंमें, साधक हृदयमें, पाचक पक्वाशय और आमाशयमें, भ्राजक त्वचामें
रहता है । ऐसे ही कफ भी अवलम्बक, क्लेदक, बोधक, तर्पक और श्लेष्मक इन
पांच भेदके क्रमकरके हृदय, आमाशय जीभ, मस्तक और सन्धि इन पांचों स्थानोंमें
रहता है । इस प्रकार सर्व दोष अपने पांच पांच स्वरूपोंसे कुपित होते हैं, इससे
यह रोग (बवासीर) बहुत दुःखकारक और अनेक प्रकारकी व्याधि (उदर और
अग्निमांद्य इत्यादि उपद्रव) कर्ता सर्व देहको क्लेशदायक और विशेषकरके कृच्छ्र-
साध्य तथा असाध्य जानना ॥
सुखसाध्यके लक्षण ।
बाह्यायां तु वलौ जातान्येकदोषोल्वणानि च ।
अ॒र्शांसि सुखसाध्यानि न चिरोत्पतितानि च ॥ ३५ ॥
बाहरके आंटेमें भई हो, एक दोषोल्वण हो और जिसको एक वर्ष व्यतीत न
भया हो, ऐसी बवासीर सुखसाध्य है ॥
कृच्छ्रसाध्य लक्षण ।
द्वंद्वजानि द्वितीयायां वलौ यान्याश्रितानि च ।
कृच्छ्रसाध्यानि तान्याहुः परिसंवत्सराणि च ॥ ३६ ॥
दो दोषोंसे प्रगट भई हो और दूसरी वली अर्थात् आंटेमें होय और जिसको
एक वर्ष व्यतीत हो गया हो ऐसी बवासीरके मस्से कृच्छ्रसाध्य होते हैं और जो
बाहरकी वलीमें द्विदोषोल्वण होय और एक दोषोल्वण दूसरी वली (दूसरे आंटे) में
होवे तो यह भी कृच्छ्रसाध्य जानना ॥