माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
by माधवकर
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेत। ( ६१ )
सकफप्रायपुरीषाः सप्रवाहिकाः । न स्रवन्ति न भिद्यन्ते
पाण्डुस्निग्धत्वगादयः ॥ २३ ॥
कफकी बवासीरके लक्षण ये हैं, जैसे कि, गुदाके मस्से महामूल ( दूर धातुके
प्रति जानेवाले ), एक दूसरेसे मिले हुए, मन्द पीडाके करनेवाले, सफेद, लम्बे,
मोटे, चिकने, करडे, गोल, भारी, स्थिर, गाढे, कफसे लिपटे, मणिके समान स्वच्छ,
खुजली बहुत होय और प्यारी लगे, करील कटहर इनके कांटेके समान होयं, दाखके
सदृश होयं, पेडूमें अफरा करनेवाले, गुदा, मूत्रस्थान और नाभि इनमें पीडा करने-
वाले, श्वास, खांसी, खाली ओकारी, लारका टपकना, अरुचि, पीनस इनको करने-
वाले, प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, मस्तकका भारी होना, शीतज्वर, नपुंसकपना, अग्निका मन्द
होना, वमनका और आम जिनमें बहुत ऐसे अतिसार, संग्रहणी आदि रोगके करने-
वाले वसा ( चर्बी ) और कफ मिला दस्त होवे, प्रवाहिका उत्पन्न करनेवाले और
मस्सोंमेंसे रुधिर न निकले, गाढा मल होनेसे भी मस्से न फूटें और शरीरका रंग
पीला और चिकना होय ये कफकी बवासीरके लक्षण हैं ॥
सन्निपातके और सहज बवासीरके लक्षण ।
सर्वैः सर्वात्मकान्याहुर्लक्षणैः सहजानि च ।
जो पूर्व वातादि तीनों दोषोंकी बवासीरोंके लक्षण कहे सो सब मिलते हों उसको
सन्निपातकी बवासीर जाननी और यही लक्षण सहज बवासीरके हैं ॥
रक्तार्शके लक्षण ।
रक्तोल्वणा गुदे कीलाः पित्ताकृतिसमन्विताः ॥ २४ ॥
वटप्ररोहसदृशा गुञ्जाविद्रुमसंनिभाः । तेऽत्यर्थं दुष्टमुष्णं च
गाढविट्कप्रपीडिताः ॥ २५ ॥ स्रवन्ति सहसा रक्तं तस्य
चातिप्रवृत्तितः । भेकाभः पीड्यते दुःखैः शोणितक्षय-
संभवः ॥ २६ ॥ हीनवर्णबलोत्साहो हतौजाः कलुषेन्द्रियः ।
विट् श्यावं कठिनं रूक्षमधोवायुर्न गच्छति ॥ २७ ॥
गुदाके मस्सोंका रंग चिरमिटीके समान होवे अथवा बटके अंकुरसे हो और
पित्तकी बवासीरके लक्षण जिसमें मिलते हों, मूँगाके सदृश हों और दस्त कठिन
उतरनेसे मस्से दबें तब उन मस्सोंमेंसे दुष्ट और गरमागरम रुधिर पडे और रुधि-
रके बहुत पडनेसे वर्षाऋतुके मेंडकके समान पीला रंग होजाय, रुधिरके निकलनेसे
जो प्रगट त्वचाका कठोरपना, नाडीका शिथिलपना और खट्टी वस्तु तथा शीतकी