माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
by माधवकर
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in context( ५४ ) माधवनिदान ।
वातग्रहणीका निदान ।
कटुतिक्तकषायातिरूक्षसंदुष्टभोजनैः । प्रमितानशनात्यध्ववेग-
निग्रहमैथुनैः ॥ मारुतः कुपितो वह्निं संछाद्य कुरुते गदान् ॥५॥
कड़ुआ, तीखा, कसैला, अतिरूखा और संयोगविरुद्ध ऐसे भोजनसे तथा थोडे
भोजनसे, उपवाससे, बहुत चलनेसे, मलमूत्रादि वेगोंके रोकनेसे, अत्यन्त मैथुनसे
कुपित भई जो वात सो अग्निको कुपित कर रोगोंको प्रगट करे हैं ॥
वातजसंग्रहणीका रूप ।
तस्यान्नं पच्यते दुःखं शुक्तपाकं खराङ्गता ॥ ६ ॥ कंठास्यशोषः
क्षुत्तृष्णा तिमिरं कर्णयोः स्वनः । पार्श्वोरुवंक्षणग्रीवारुगभीक्ष्णं
विषूचिका ॥ ७ ॥ हृत्पीडाकार्श्यदौर्बल्यं वैरस्यं परिकर्तिका ।
गृद्धिः सर्वरसानां च मनसः स्पंदनं तथा ॥ ८ ॥ जीर्णे जीर्यति
चाध्मानं भुक्तं स्वास्थ्यमुपैति च । स वातगुल्महृद्रोगप्लीहा-
शङ्की च मानवः ॥ ९ ॥ चिराद्दुःखं द्रवं शुष्कं तन्वामं शब्द-
फेनवत् । पुनः पुनः सृजेद्वर्चः कासश्वासार्दितोऽनिलात् ॥ १० ॥
उस वातग्रहणीवालेके अन्न दुःखसे पचे, अन्नका पाक खट्टा होय, अंगमें कर्क-
शता ( यह वायुको त्वचाके चिकनापन सोखनेसे होता है ), कण्ठ मुखका सूखना,
भूख, प्यास लगे, मन्द दीखे, कानोंमें शब्द हो, पसवाडे जांघ पेडू और कन्थामें
पीडा होवे, विषूचिका हो अर्थात् दोनों द्वारसे कच्चे अन्नकी प्रवृत्ति होवे, हृदय दुखे,
देह दुबला होजाय, जीभका स्वाद जाता रहे, गुदामें कतरनीकीसी पीडा हो, मीठेसे
आदि ले सर्व रसोंके खानेकी इच्छा, मनमें ग्लानि, अन्न पचने उपरांत पेटका
फूलना, भोजन करनेसे स्वस्थता, पेटमें गोला, हृद्रोग, तापतिल्लीकीसी शंका, वातके
योगसे खांसी, श्वाससे पीडित, बहुत देरमें बडे कष्टसे कभी पतला कभी गाढा थोडा
शब्द और झाग मिला वारम्वार दस्त हो जाय ॥
पित्तग्रहणीके लक्षण ।
कट्वजीर्णविदाह्यम्लक्षाराद्यैः पित्तमुल्बणम् । आप्लावयेद्धन्त्य-
नलं जलं तप्तमिवानलम् ॥११॥ सोऽजीर्णं नीलपीताभं पीताभः
सार्यते द्रवम् । संधूमोद्गारहृत्कण्ठदाहारुचितृडर्दितः ॥ १२ ॥
१ पृष्ट्यम्लोद्गार इत्यापि पाठः। दुर्गन्ध डकार तथा खट्टी डकार आवे ।