माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
by माधवकर
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेत । ( ३१५ )
रक्ताभिष्यन्दके लक्षण ।
ताम्राश्रुता लोहितनेत्रता च राज्यः समन्तादतिलोहिताश्च ।
पित्तस्य लिङ्गानि च यानि तानि रक्ताभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ९ ॥
रक्ताभिष्यन्दसे नेत्रोंसे लाल पानी गिरे, नेत्र लाल होंय, नेत्रोंमें आस पास
रेखासी लाललाल दीखे, जो पित्ताभिष्यन्दके लक्षण कहे वे सब लक्षण होवें ॥
अभिष्यन्दसे अधिमन्थकी उत्पत्ति होती है, सो कहते हैं-
वृद्धैरेतैरभिष्यन्दैर्नराणामक्रियावताम् ।
तावन्तस्त्वधिमन्थाः स्युर्नयने तीव्रवेदनाः ॥ १० ॥
इस अभिष्यन्दमें औषधोपचार न करनेसे यह बढकर उतनेही ( चार ) अभि-
ष्यन्दरोग नेत्रोंमें प्रगट होंयँ, इससे नेत्रोंमें तीव्र पीडा होय, यह अधिमन्थके सामान्य
लक्षण हैं । वेदनाशब्द इस जगह व्यथामात्रका वाचक है, इससे यह प्रगट हुआ
कि, वातके अभिष्यन्दसे वातिक अधिमन्थ प्रगट होय, उसमें तीव्र वातज सर्व
निस्तोदादि पीडा युक्त होंयँ, इसी प्रकार पित्तकेसे, कफकेसे, रुधिरकेसे पित्त कफ-
रुधिरके अधिमन्थ स्वलक्षण करके जानने ॥
उत्पाट्यत इवात्यर्थं नेत्रं निर्मथ्यते तथा ।
शिरसोऽर्धं च तं विद्यादधिमन्थं स्वलक्षणैः ॥ ११ ॥
दूसरे सामान्य लक्षण-आधे शिरमें उपाडनेकीसी पीडा होय अथवा तोडनेकीसी
तथा मथनेकीसी पीडा होय, व्याधिके प्रभावसे आधे शिरमें पीडा हो इसे अधिमन्थ
कहते हैं इनके लक्षण वातज अभिष्यन्दके समान जानने ॥
दोषभेदसे कालमर्यादाके लक्षण ।
हन्याद्दृष्टिं श्लैष्मिकः सप्तरात्राद्योऽधीमन्थो रक्तजः पंचरात्रात् ।
षड्रात्राद्वा वातिको वै निहन्यान्मिथ्याचारात्पैत्तिकः सद्य एव ॥ १२॥
कफका अधिमन्थ सात दिनमें दृष्टिका नाश करे, रक्तज अधिमन्थ पांच दिनमें,
वातिक अधिमन्थ छः ।दिनमें और पैत्तिक अधिमन्थ मिथ्योपचारसे तत्काल ( तीन
दिनमें ) दृष्टिका नाशकरे अर्थात् आंख जाती रहे । इस जगह जो कालकी अवधि
कही है सो व्याधिके स्वभावसे तथा लंघन प्रलेपादि क्रिया करके तथा अञ्जनानिषे-
धके निमित्त कहीं है ॥
नेत्ररोगके सामान्य लक्षण ।
उदीर्णवेदनं नेत्रं रागोद्रेकसमन्वितम् ।
घर्षनिस्तोदशूलाश्रुयुक्तमामान्वितं विदुः ॥ १३ ॥
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