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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 329 of 404

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Page 329

भाषाटीकासमेत । ( ३११ )
सान्निपातिकके लक्षण ।
भूत्वा भूत्वा प्रतिश्यायो यस्याकस्मान्निवर्त्तते ।
स पक्को वाप्यपक्को वा स तु सर्वभवः स्मृतः ॥ २२ ॥
जिसकी नाकमें पूर्वोक्त कहे सो सर्व लक्षण मिलें, तथा वह पीनस बारबार
होकर पककर, अथवा बिना पके नष्ट हो जाय, उसको सन्निपातकी पीनस कहते हैं ।
यह विदेहे आचार्यके मतसे असाध्य है ॥
दुष्टप्रतिश्यायके लक्षण ।
प्रक्लिद्यते पुनर्नासा पुनश्च परिशुष्यति ।
पुनरानह्यते चापि पुनर्विव्रीयते तथा ॥ २३ ॥
निश्वासो वाति दुर्गन्धो नरो गन्धं न वेत्ति च ।
एवं दुष्टप्रतिश्यायं जानीयात्कृच्छ्रसाधनम् ॥ २४ ॥
बारबार जिसंकी नाक झड़ाकरे और सूखजाय और नाकसे अच्छी तरह श्वास
नहीं आवे, नाक रुकजाय और फिर खुलजाय, श्वास लेनेमें बास आवे तथा उस
रोगीको सुगंध दुर्गंधका ज्ञान जाता रहे, ऐसे लक्षण होनेसे इसको दुष्टप्रतिश्याय
कहते हैं, यह कष्टसे साध्य होती है । यह पीनस पांच पीनसोंके अंतर्गत जाननी
इनका ही भेद है यह छठी नहीं हैं ॥
रक्तप्रतिश्यायके लक्षण ।
रक्तजे तु प्रतिश्याये रक्तस्रावः प्रवर्तते ।
ताम्राक्षश्च भवेज्जन्तुरुरोघातप्रपीडितः ॥ २५ ॥
दुर्गन्धोच्छ्वासवदनो गन्धानपि न वेत्ति सः ॥ २६ ॥
रुधिरके पीनसमें नाकसे रुधिर गिरे, नेत्र लाल होयँ, उरःक्षतकी पीडाके सदृश पीडा
होय, श्वास अथवा मुखमें बास आवे, सुगंध दुर्गंधका ज्ञान नहीं होय । उरःक्षतके
लक्षण ग्रन्थान्तरमें लिखे हैं सो जानने । किसी पुस्तकमें-“ पित्तप्रतिश्यायकृतै-
र्लिङ्गैश्चापि समन्वितः ” ऐसा पाठ है । इसका अर्थ यह है कि, जिसमें पित्तकी
पीनसके लक्षण मिलते हों ॥
१ नृणां दुष्टप्रतिश्यायः सर्वजश्च न सिद्धयति । इति विदेहः ।
२ उरःक्षतं गुरुस्तम्भः पूतिकर्णकफो रसः । सकासः सज्वरो ज्ञेय उरोघातः सपीनसः ॥
अत्र पित्तप्रतिश्यायलिंगान्यपि बोद्धव्यानि, तुल्यत्वात् पित्तरक्तयोः ॥