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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 322 of 404

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Page 322

( ३०४ ) माधवनिदान ।
कृमिकर्णके लक्षण ।
यदा तु मूर्च्छां त्वथवापि जन्तवः सृजन्त्यपत्यान्यथवापि मक्षिकाः ।
तदंजनत्वाच्छ्रवणो निरुच्यते भिषग्भिराद्यैः कृमिकर्णको गदः ॥ ८ ॥
जिस समय कीडे पडजायँ, अथवा मक्सी अण्डा धरे, कृमिलक्षण होनेसे श्रवण
कहते हैं और इसी रोगको द्वितीय पर्यायवाची शब्द कृमिकर्ण कहते हैं ॥
कानमें पतंगादि कीडा धरनेके कारण ।
पतङ्गः शतपद्यश्च कर्णस्रोतः प्रविश्य हि ।
अरतिं व्याकुलत्वं च भृशं कुर्वन्ति वेदनाम् ॥ ९ ॥
कर्णो निस्तुद्यते तस्य तथा फुरफुरायते ।
कीटे चरति रुक्तीव्रा निस्पन्दे मन्दवेदना ॥ १० ॥
पतंग, कनखजूरा, गिजाई आदि कानमें धसनेसे बेचैनी होय, जीव व्याकुल
होय और कानमें पीडा होय, तथा कानमें नोचनेकीसी पीडा होय और वह कीडा,
कानके भीतर फडके और फिरे उस समय घोर पीडा होय और जब वह बन्द हो
तब पीडा बन्द होवे ॥
विविधकर्णविद्रधिके लक्षण ।
क्षताभिघातप्रभवस्तु विद्रधिर्भवेत्तथा दोषकृतोऽपरः पुनः ।
स रक्तपीतारुणरक्तमास्रवेत्प्रतोदधूमायनदाहचोषवान् ॥ ११ ॥
कानमें खुजानेसे व्रण हो जाय, चोट लगनेसे कानमें व्रण होकर विद्रधि होय
उसी प्रकार वातादिदोषों करके दूसरे प्रकारकी विद्रधि होय है, जब वह फूटे तब
उसमेंसे लाल पीला रुधिर बहे, नोचनेकीसी पीडा होवै, धुआंसा निकलता मालूम
होवै, दाह होवै, चूसनेकीसी पीडा होवै ॥
कर्णपाकके लक्षण ।
कर्णपाकस्तु पित्तेन कोथविक्लेदकृद्भवेत् ।
कर्णे विद्रधिपाकाद्वा जायते चाम्बुपूरणात् ॥ १२ ॥
पित्तसे अथवा कान पकनेसे कानमें पानी जानेसे कर्णपाक रोग होवे उस करके
कान सडजावे और गीला रहै ॥
पूतिकर्णके लक्षण ।
पूयं स्रवति वा पूति स ज्ञेयः पूतिकर्णकः ।
जिसके कानमें राध निकले वा बास आवे, उसको पूतिकर्ण कहते हैं ॥
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