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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 312 of 404

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Page 312

( २९४ ) माधवनिदान ।
जिस व्याधिकरके मुख टेढा होकर दांत फूटने लगे वह भञ्जक व्याधि कफ-
वातकरके होय, दांत भंगकारी दोषके प्रभावसे मुख भी टेढा होय है ॥
दन्तहर्षके लक्षण ।
शीतरूक्षप्रवाताम्लस्पर्शानामसहा द्विजाः ।
पित्तमारुतकोपेन दन्तहर्षः स नामतः ॥ २८ ॥
दांत शीतल, रूक्ष, खटाई इत्यादि पदार्थ और पवन इनके लगनेको जो नहीं
सहिसके, उसको दन्तहर्ष कहते हैं, वह रोग पित्तवायुके कोपसे होय है । इस रोगको
वातज होनेपर भी उष्ण ( गरमी ) को नहीं सहिसके, यह व्याधिका स्वभाव है ।
इस जगह दूसरा जो पाठ है वह नीचे लिखा है ॥
दन्तशर्कराके लक्षण ।
मलो दन्तगतो यस्तु पित्तमारुतशोषितः ।
शर्करेव खरस्पर्शा सा ज्ञेया दन्तशर्करा ॥ २९ ॥
दांतोंका मल पित्तवायुके प्रभावसे सूखकर रेतके समान खरदरा स्पर्श मालूम
होय, उस रोगको दन्तशर्करा कहते हैं । इस श्लोकमें "सा दंतानागुणहरा" ऐसा भी
पाठ है, इसका यह अर्थ हुआ कि, दांतोंके गुण शुक्ल और दृढादि उनको दूर करे॥
कपालिकाके लक्षण ।
कपालेष्विव दीर्णेषु दन्तानां सैव शर्करा ।
कपालिकेति सा ज्ञेया सदा दन्तविनाशिनी ॥ ३० ॥
कपाल कहिये मिट्टीके घडा आदिके जैसे टूक होय हैं ऐसे दांत मल करके सहित
हो जायें तो उसे पूर्वोक्त दन्तशर्कराको कपालिका ऐसे कहते हैं। यह रोग दांतोंका
सदा नाश करता है,॥
श्यावदन्तके लक्षण ।
योऽसृङ्मिश्रेण पित्तेन दग्धो दन्तस्त्वशेषतः ।
श्यावतां नीलतां वापि गतः स श्यावदन्तकः ॥ ३१ ॥
जो दांत रुधिरसे मिले, पित्तसे जलेके समान सब काले हो जायँ उनको
श्यावदन्त कहते हैं ॥
१ शीतमुष्णं च दशनाः सहन्ते. स्पर्शनं न च । यस्य दन्तं च हर्षे तु विद्यात्पित्तसमीरणात्॥