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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 296 of 404

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Page 296

( २७८ ) . माधवनिदान ।
विवृतापिडिकाके लक्षण ।
विवृतास्यां महादाहां पक्वोदुम्बरसन्निभाम् ।
परिमंडलां पित्तकृतां विवृतां नाम तां विदुः ॥ ४ ॥
पित्तके योगसे फटे मुखकी, अत्यन्त दाहयुक्त, पके गूलरके समान, चारों ओर
वल पडी हुई जो पिडिका होय उसको विवृता कहते हैं ॥
कच्छपिकाके लक्षण ।
ग्रथिता पञ्च वा षड् वा दारुणाः कच्छपोन्नताः ।
कफानिलाभ्यां पिडिका ज्ञेया कच्छपिका बुधैः ॥ ५ ॥
कफ वायुसे प्रगट गांठ बन्धी, पांच अथवा छः, कठिन कछुओके पीठके समान
ऊंची जो पिडिका होयँ उनको कच्छपिका कहते हैं ॥
वल्मीकपिडिकाके लक्षण ।
ग्रीवांसकक्षकरपाददेशे संधौ गले वा त्रिभिरेव दोषैः ।
ग्रन्थिः सवल्मीकवदक्रियाणां जातः क्रमेणैव गतः प्रवृद्धिम् ॥ ६ ॥
मुखैरनेकैः स्रुतितोदवद्भिर्विसर्पवत्स्र्पति चोन्नताग्रैः ।
वल्मीकमाहुर्भिषजो विकारं निष्प्रत्यनीकं चिरजं विशेषात् ॥७॥
नाड, कन्धा, कूंख, हाथ, पैर, सन्धि, गला इन ठिकाने तीनों दोषोंसे सर्पकी
बांबीके समान गांठ होय, उसका उपाय न करे तब वह धीरे धीरे बढे, उसमें
अनेक मुख हो जायँ, उसमेंसे स्राव होय, नोचनेकीसी पीडा होय तथा वह मुखक
ऊपर कुछ ऊंची होकर विसर्पके समान फैल जाय, इस रोगको वैद्य वल्मीक
कहते हैं । इसके ऊपर औषध उपचार नहीं चले और पुराने होनेसे विशेष
असाध्य जाननी ॥
इन्द्रवृद्धाके लक्षण ।
पद्मकर्णिकवन्मध्ये पिडिकाभिः समाचिताम् ।
इन्द्रवृद्धां तु तां विद्याद्वातपित्तोत्थितां भिषक् ॥ ८ ॥
कमलकार्णिकाके समान बीचमें एक पिडिका होय, उसके चारोंओर छोटी छोटी
फुन्सी होयँ, उसको इन्द्रवृद्धा कहते हैं, यह वात पित्तसे उत्पन्न होय है ॥
गर्दभिकाके लक्षण ।
मंडलं वृत्तमुत्सन्नं सरक्तं पिडिकाचितम् ।
रुजाकरीं गर्दभिकां तां विद्याद्वातपित्तजाम् ॥ ९ ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA